सरपंची बचाने हाईकोर्ट का सहारा, अब 117 सरपंचों से चंदे की गुहार! गरीबी के दावे से लेकर लग्जरी जिंदगी तक उठे सवाल
पंचों का विरोध, अविश्वास प्रस्ताव के दौरान कथित धक्का-मुक्की और मारपीट के आरोप; ग्रामीण पूछ रहे—दो साल में ऐसा कौन-सा कल्पवृक्ष उगा कि बदली पूरी तस्वीर?

संपादक:- मीनू साहू
बालोद(AD न्यूज):- बालोद जिला के गुण्डरदेही जनपद पंचायत के ग्राम पंचायत कोटगांव की सरपंच देवेश्वरी साहू को अपर कलेक्टर बालोद से स्थगन मिलने के बाद मामला अब हाईकोर्ट की दहलीज तक पहुंचने की तैयारी में है। इसी बीच 117 सरपंचों से कम से कम एक-एक हजार रुपये आर्थिक सहयोग की अपील ने विवाद को नया मोड़ दे दिया है। अपील में आर्थिक कठिनाई का हवाला देकर हाईकोर्ट की कानूनी लड़ाई में सहयोग मांगा गया है।लेकिन अब ग्रामीणों का सवाल है—यदि आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है तो पिछले दो वर्षों में जीवनशैली में कथित बदलाव कैसे आया?ग्रामीणों का दावा है कि सरपंच चुनाव से पहले संबंधित परिवार की आर्थिक स्थिति आज की तुलना में बिल्कुल अलग थी। उनका आरोप है कि सरपंच बनने के बाद आलीशान मकान और लग्जरी वाहन जैसी सुविधाएं दिखाई देने लगीं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और आय के वैध स्रोतों का दस्तावेजी परीक्षण अलग विषय है, लेकिन यही विरोधाभास अब ग्रामीणों के बीच चर्चा का बड़ा कारण बन गया है।
गरीबी की अपील या जवाबदेही से बचने की कोशिश?
117 सरपंचों से एक-एक हजार रुपये सहयोग की अपील की जाए तो राशि 1.17 लाख रुपये तक पहुंचती है। ऐसे में सवाल केवल सहयोग का नहीं, बल्कि पारदर्शिता का है।कितनी राशि वास्तव में वकील की फीस में लगेगी? कितनी न्यायालयीन प्रक्रिया में खर्च होगी? पैसा किस खाते या व्यक्ति के पास जमा होगा? सहयोग करने वाले सरपंचों को उसका हिसाब कब मिलेगा?यदि आर्थिक सहयोग लिया जाता है तो इन सवालों के जवाब सार्वजनिक करना ही विश्वास कायम करने का सबसे सीधा रास्ता होगा।
अविश्वास प्रस्ताव के दिन क्या हुआ था?
मामले का सबसे गंभीर पहलू उस दिन से जुड़ा है, जब सरपंच के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया हुई थी। ग्रामीणों का आरोप है कि उस दौरान सरपंच पक्ष की ओर से बुलाए गए कुछ लोगों ने पंचों को बैठक की प्रक्रिया में आगे बढ़ने से रोकने का कथित प्रयास किया।ग्रामीणों के अनुसार, विवाद इतना बढ़ गया कि एक गर्भवती महिला पंच के साथ कथित तौर पर गला दबाने जैसी हरकत की गई तथा एक अन्य व्यक्ति के कपड़े फाड़े जाने का आरोप भी सामने आया।ये आरोप गंभीर हैं और इनकी पुष्टि पुलिस जांच, मेडिकल रिकॉर्ड, वीडियो फुटेज, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान अथवा न्यायिक प्रक्रिया से ही हो सकती है। यदि ऐसे आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल पंचायत की राजनीतिक खींचतान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कथित हिंसा और कानून-व्यवस्था का विषय भी बन सकता है।
कानून क्या कहता है?
पंचायत पदाधिकारी के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव कोई भीड़ के दबाव से तय होने वाली प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। छत्तीसगढ़ में ग्राम पंचायत के सरपंच एवं उपसरपंच के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया के लिए 1994 के नियम लागू हैं, जिनमें नोटिस, बैठक, पीठासीन अधिकारी और कार्यवाही से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं।इसलिए यदि बैठक के दौरान किसी व्यक्ति को बलपूर्वक रोकने, धमकाने या शारीरिक रूप से चोट पहुंचाने का आरोप है, तो उसका परीक्षण पंचायत कानून से अलग सामान्य आपराधिक कानून के तहत भी किया जा सकता है। कौन-सी धाराएं लागू होंगी, यह घटना की वास्तविक परिस्थितियों, चोट, मेडिकल रिपोर्ट, वीडियो और जांच के तथ्यों पर निर्भर करेगा।
पंचों का भरोसा नहीं तो पंचायत कैसे चलेगी? यह पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है।
यदि ग्राम पंचायत के निर्वाचित पंचों का बड़ा हिस्सा सरपंच के खिलाफ है, तो केवल अदालत से अंतरिम राहत मिल जाना पंचायत के भीतर पैदा हुए राजनीतिक और प्रशासनिक टकराव का समाधान नहीं है।सरपंच को कानूनी अधिकार प्राप्त हो सकते हैं, लेकिन पंचायत चलाने के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ समन्वय भी जरूरी है। क्या जिस पंचायत में विश्वास का संकट इतना गहरा हो चुका है, वहां विकास कार्यों पर सहमति बनेगी? क्या हर निर्णय विवाद का कारण बनेगा? और क्या ग्रामीणों का हित इस टकराव के बीच पीछे नहीं छूट जाएगा?
अब जवाब केवल अदालत में नहीं, गांव के सामने भी चाहिए
कोटगांव में सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि सरपंच पद पर कौन रहेगा। सवाल यह भी है कि सार्वजनिक पद की गरिमा, पंचायत की कार्यप्रणाली और आर्थिक पारदर्शिता कैसे कायम रहेगी।गरीबी का दावा करने से पहले आय के स्रोत स्पष्ट हों, सहयोग मांगने से पहले खर्च का हिसाब सामने आए और अविश्वास के बीच पंचायत चलाने से पहले पंचों का विश्वास बहाल करने की पहल हो—यही अब कोटगांव के ग्रामीणों की असली मांग बनती दिखाई दे रही है।क्योंकि पद बचाने की लड़ाई अदालत में लड़ी जा सकती है, लेकिन पंचायत का भरोसा अदालत के आदेश से नहीं—काम, पारदर्शिता और जनविश्वास से हासिल करना पड़ता है।



