हमर छत्तीसगढ़

गुंडरदेही में ‘गुंडा-बदमाश’ पोस्टर पर बड़ा सवाल

अपराध रोकने की मुहिम या कानून की हद से आगे निकलती पुलिसिंग?

संपादक:- मीनू साहू 

बालोद:- बालोद जिले के गुंडरदेही थाना क्षेत्र में 10 व्यक्तियों के नाम, फोटो, उम्र, कथित अपराधों का विवरण और “गुंडा बदमाश” जैसी पहचान के साथ जारी दिखाई दे रहा पोस्टर अब पुलिस की सख्ती से ज्यादा कानूनी प्रक्रिया, नागरिक अधिकार और सार्वजनिक गरिमा का मुद्दा बनता नजर आ रहा है। अपराध नियंत्रण के लिए पुलिस द्वारा निगरानी सूची तैयार करना अलग विषय है, लेकिन ऐसी सूची को इस तरह सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना क्या हर परिस्थिति में कानूनसम्मत है? यही वह सवाल है, जिसका जवाब पुलिस प्रशासन को तथ्यों और नियमों के साथ देना चाहिए।

पोस्टर में जिन लोगों के नाम और चेहरे दिखाई दे रहे हैं, उनके संबंध में विभिन्न अपराधों का उल्लेख किया गया है। लेकिन किसी व्यक्ति का पुलिस रिकॉर्ड में नाम होना और न्यायालय द्वारा किसी अपराध में दोषी ठहराया जाना दो अलग-अलग कानूनी स्थितियां हैं। यही अंतर कानून के शासन की बुनियादी पहचान है।

यदि कोई व्यक्ति वास्तव में अपराध में संलिप्त है और उससे सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा है तो पुलिस के पास कार्रवाई करने के लिए कानून में पर्याप्त अधिकार और प्रक्रियाएं मौजूद हैं। मगर सवाल यह है कि क्या अपराध नियंत्रण के नाम पर किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से कलंकित करने की सीमा भी कानून ने निर्धारित की है?

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को पुलिस प्रशासन नजरअंदाज कैसे कर सकता है?

Dr. Mehmood Nayyar Azam बनाम State of Chhattisgarh मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस हिरासत में व्यक्ति के साथ अपमानजनक व्यवहार को गंभीरता से लिया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की मानवीय गरिमा और सम्मान संविधान के अनुच्छेद 21 के संरक्षण का हिस्सा हैं।

इस फैसले का व्यापक संदेश बिल्कुल साफ है—पुलिस की शक्ति असीमित नहीं है। अपराध की जांच करना पुलिस का अधिकार है, लेकिन आरोपी या संदिग्ध व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जा सकता जिससे उसकी मानवीय गरिमा अनावश्यक रूप से प्रभावित हो।

यहीं से गुंडरदेही के इस पोस्टर को लेकर बहस और ज्यादा गंभीर हो जाती है। यदि प्रशासन का उद्देश्य केवल जनता को अपराधियों से सावधान करना है तो भी यह जांचना जरूरी है कि नाम, फोटो और कथित अपराधों को सार्वजनिक करने की पूरी प्रक्रिया किस वैधानिक प्रावधान के तहत की गई है।

Regulation 855 के नाम पर कितनी पारदर्शिता?

छत्तीसगढ़ पुलिस विनियम की Regulation 855 निगरानी व्यवस्था से संबंधित प्रावधानों में आती है। इसका उद्देश्य अपराध की पुनरावृत्ति और सार्वजनिक शांति के लिए संभावित खतरे पर पुलिस निगरानी रखना है। लेकिन निगरानी सूची में शामिल किया जाना अपने आप में न्यायालय की दोषसिद्धि नहीं है।

इसलिए पुलिस प्रशासन को यह बताना चाहिए कि इस सूची में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के संबंध में कौन-सा रिकॉर्ड उपलब्ध है, किस सक्षम अधिकारी ने कार्रवाई की, क्या निर्धारित प्रक्रिया पूरी हुई और क्या समय-समय पर समीक्षा की गई?

यदि किसी व्यक्ति के पुराने मामले समाप्त हो चुके हैं, वह न्यायालय से बरी हो चुका है अथवा वर्तमान में उसके विरुद्ध कोई गंभीर गतिविधि दर्ज नहीं है, तो उसकी सार्वजनिक पहचान को लगातार इसी रूप में प्रदर्शित करने का औचित्य भी सवालों के घेरे में आ सकता है।

गुंडरदेही पुलिस से अब जवाब जरूरी

यह मामला केवल 10 नामों का नहीं, बल्कि पुलिसिंग के तरीके का सवाल है। जनता अपराधियों पर कार्रवाई चाहती है, लेकिन साथ ही यह भी चाहती है कि कानून लागू करने वाली संस्था स्वयं कानून की कसौटी पर खरी उतरे।

पुलिस प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए—यह पोस्टर किस आदेश पर तैयार हुआ? इसे सार्वजनिक करने की अनुमति किस अधिकारी ने दी? इसमें दर्ज प्रत्येक आरोप की वर्तमान कानूनी स्थिति क्या है? क्या संबंधित व्यक्तियों को कानून के मुताबिक अपना पक्ष रखने का अवसर मिला? और क्या इस सूची की नियमित समीक्षा की गई है?

यदि इन सवालों के जवाब नियमों और दस्तावेजों के आधार पर स्पष्ट हैं, तो पुलिस को उन्हें सार्वजनिक करना चाहिए। यदि प्रक्रिया में कमी है, तो जिम्मेदार अधिकारियों को उसे सुधारना चाहिए।

अपराधियों पर कार्रवाई हो, मगर कानून की सीमा में

अपराध नियंत्रण के नाम पर पुलिस की कठोरता जरूरी हो सकती है, लेकिन कठोर पुलिसिंग और मनमानी पुलिसिंग के बीच एक बेहद महीन कानूनी रेखा होती है। पुलिस अदालत नहीं है और किसी पोस्टर को न्यायालय का फैसला नहीं माना जा सकता।

दोष सिद्ध होने से पहले किसी व्यक्ति के बारे में सार्वजनिक धारणा को इस तरह प्रभावित करना कि वह पहले से ही अपराधी घोषित दिखाई दे, निष्पक्ष प्रक्रिया और गरिमा के संवैधानिक सिद्धांतों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

गुंडरदेही में जारी इस पोस्टर ने इसलिए एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या अपराध रोकने के लिए पुलिस ने कानून का सहारा लिया है, या कानून लागू करने की जल्दबाजी में खुद कानूनी सवालों के घेरे में आ गई है?

कार्रवाई का दावा पर्याप्त नहीं—उस कार्रवाई का वैधानिक आधार भी सामने आना चाहिए। कानून का राज तभी मजबूत होगा, जब अपराधी कानून से डरेंगे और कानून लागू करने वाले भी कानून के प्रति उतने ही जवाबदेह रहेंगे।

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