दुर्ग की पढ़ाई से देश की रक्षा तक कश्मीर के लाल चौक से बस्तर के नक्सल मोर्चे तक ताहिर अली ने लिखी 22 साल की राष्ट्रसेवा की गौरवगाथा
अररिया की पहली पोस्टिंग से असम, जम्मू-कश्मीर और छत्तीसगढ़ तक निभाया कर्तव्य; 28वीं वाहिनी अंतागढ़ से नायब सूबेदार पद पर सेवानिवृत्त ताहिर अली का हुआ सम्मान

संपादक:- मीनू साहू
गुरुर/छत्तीसगढ़। कुछ जीवन यात्राएं केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों की कहानी नहीं होतीं, बल्कि वे समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाती हैं। ताहिर अली पिता कासम अली, भाई शादिक अली, का जीवन भी ऐसी ही प्रेरक यात्रा है। दुर्ग में कॉलेज की पढ़ाई करने पहुंचे एक युवा के मन में देश सेवा का ऐसा जज्बा जागा कि उन्होंने पढ़ाई के बीच ही राष्ट्र की सेवा को अपना लक्ष्य बना लिया। इसके बाद शुरू हुआ सफर उन्हें बिहार से लेकर असम, जम्मू-कश्मीर और छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों तक ले गया।
ताहिर अली की पहली पोस्टिंग बिहार के अररिया जिले के बथनाहा में हुई। सेवा के दौरान उन्होंने करीब सात राज्यों में अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाईं। असम की परिस्थितियों से लेकर जम्मू-कश्मीर के संवेदनशील इलाकों और फिर छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र तक उनका सेवाकाल चुनौतियों से भरा रहा।
उनकी सेवा यात्रा का बेहद महत्वपूर्ण अध्याय जम्मू-कश्मीर का लाल चौक रहा। संवेदनशील क्षेत्र में ड्यूटी के दौरान हर पल सतर्कता, साहस और जिम्मेदारी की आवश्यकता होती थी। ताहिर अली ने वहां अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाई। इसके बाद छत्तीसगढ़ में उन्होंने बस्तर क्षेत्र में नक्सल विरोधी अभियानों का हिस्सा बनकर भी अपनी सेवाएं दीं।
बस्तर की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और चुनौतीपूर्ण सुरक्षा वातावरण के बीच ड्यूटी निभाना आसान नहीं था। जंगलों और दुर्गम क्षेत्रों में तैनाती के दौरान सुरक्षा बलों के जवानों को शारीरिक क्षमता के साथ मानसिक दृढ़ता की भी आवश्यकता होती है। ताहिर अली ने अपने सेवाकाल में इन चुनौतियों का सामना करते हुए राष्ट्र सेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
सेवा के अंतिम पड़ाव में वे 28 वीं वाहिनी, अंतागढ़, छत्तीसगढ़ में नायब सूबेदार के पद तक पहुंचे और इसी पद से सेवानिवृत्त हुए।
उनके सम्मान के अवसर पर क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पूर्व सैनिकों और युवाओं ने उनकी सेवाओं को याद करते हुए कहा कि ताहिर अली की कहानी समाज में सकारात्मक संदेश देने वाली है।
पूर्व विधायक भैयाराम सिन्हा ने कहा कि देश की सुरक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले सैनिकों का सम्मान वास्तव में पूरे समाज का सम्मान है। उन्होंने कहा कि ताहिर अली ने अलग-अलग राज्यों और कठिन परिस्थितियों में जिस समर्पण के साथ जिम्मेदारी निभाई, वह युवाओं के लिए प्रेरणादायक है।
गुरुर ब्लॉक अध्यक्ष डॉ. किशोर साहू ने कहा कि देश सेवा किसी जाति, धर्म या क्षेत्र की सीमा में नहीं बंधती। तिरंगे के नीचे हर भारतीय की पहचान एक होती है। उन्होंने ताहिर अली की सेवा यात्रा को सामाजिक एकता और राष्ट्रभक्ति का सकारात्मक उदाहरण बताया।
महामंत्री शादिक अली ने कहा कि ताहिर अली की यात्रा परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए गर्व की बात है। कॉलेज के दिनों से देश सेवा का सपना देखना और फिर वर्षों तक कठिन परिस्थितियों में उसे निभाना उनके दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।
पूर्व ब्लॉक अध्यक्ष ओंमकार साहू ने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद भी ऐसे पूर्व सैनिकों के अनुभव समाज और युवाओं के लिए अमूल्य हैं। उन्होंने युवाओं से अनुशासन, मेहनत और राष्ट्रहित को जीवन का आधार बनाने की अपील की।
पूर्व आर्मी ऑफिसर शोभित पटेल ने कहा कि वर्दी पहनना केवल नौकरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और अनुशासन का संकल्प है। उन्होंने ताहिर अली के लंबे सेवाकाल को सम्मान और गौरव का विषय बताया।
इस अवसर पर रामनाथ नागेश्वर, हरिचंद साहू, देवेंद्र यादव, द्वारिका, असवन साहू, पुरुषोत्तम, शिवेंद्र, भावेश, आर्यन, आदित्य, निखिल और हितेन्द्र सहित अन्य लोगों ने भी ताहिर अली की सेवाओं को याद करते हुए उनके उज्ज्वल सेवानिवृत्त जीवन की शुभकामनाएं दीं।
ताहिर अली की कहानी का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि उन्होंने देश सेवा को किसी पहचान की सीमा में नहीं बांधा। अररिया से असम, कश्मीर के लाल चौक से बस्तर तक उनका सफर भारत की विविधता में एकता और राष्ट्र प्रथम की भावना का प्रतीक है।
दुर्ग की कॉलेज की पढ़ाई के दौरान देश सेवा का सपना देखने वाले ताहिर अली ने 22 साल तक उसे अपने कर्तव्य से साबित किया। आज उनकी कहानी युवाओं को यही संदेश देती है कि देशभक्ति केवल बोलने की चीज नहीं, बल्कि उसे जीवनभर अपने कर्मों से निभाने का नाम है।



