हमर छत्तीसगढ़

अदालत की चोट और प्रचार की ढाल बालोद प्रशासन पर उठते तीखे सवाल

 

संपादक :- मीनू साहू 

बालोद :- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में इन दिनों प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर जबरदस्त बहस छिड़ गई है। एक ओर जिला प्रशासन द्वारा कलेक्टर दिव्या मिश्रा की छवि को राष्ट्रीय सर्वे और पुरस्कारों के सहारे चमकाने की कोशिशें तेज हैं, तो दूसरी ओर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले ने प्रशासनिक निर्णयों की वैधानिकता और जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत द्वारा चार प्राचार्यों के निलंबन आदेश को निरस्त किए जाने के बाद अब पूरे मामले को प्रशासनिक लापरवाही, अधिकारों के दुरुपयोग और नियमों की अनदेखी के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

हाईकोर्ट ने अपने स्पष्ट आदेश में कहा कि द्वितीय श्रेणी राजपत्रित अधिकारियों को निलंबित करने का अधिकार कलेक्टर के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। इसके बावजूद जारी किया गया आदेश कानूनी सीमाओं से बाहर माना गया और अदालत ने उसे निरस्त कर दिया। इस फैसले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर प्रशासनिक कुर्सियों पर बैठे अधिकारी बिना विधिक परीक्षण और अधिकारों की पुष्टि किए इतने गंभीर आदेश कैसे जारी कर रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि अदालत हस्तक्षेप नहीं करती तो निर्दोष अधिकारियों का भविष्य प्रभावित हो सकता था।

शिक्षक संगठनों और कई सामाजिक समूहों ने इस पूरे घटनाक्रम को प्रशासनिक अहंकार और जल्दबाजी का परिणाम बताया है। उनका कहना है कि नियमों को ताक पर रखकर लिए गए फैसले शासन व्यवस्था को कमजोर करते हैं और कर्मचारियों के बीच भय तथा असुरक्षा का माहौल पैदा करते हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या जिले में निर्णय लेने से पहले विधि विशेषज्ञों की राय लेना अब औपचारिकता भर रह गई है।

इसी बीच प्रशासन समर्थित प्रचार तंत्र द्वारा सर्वे और सम्मान की खबरों को बड़े स्तर पर प्रचारित किया जा रहा है, जिससे विरोधी पक्ष इसे “छवि बचाने की कवायद” बता रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जमीन पर जनता का अनुभव ही किसी अधिकारी की असली परीक्षा होता है, न कि प्रायोजित सर्वे या प्रचार अभियान। जनता के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि प्रशासनिक आदेश बार-बार अदालत में टिक नहीं पा रहे, तो फिर ऐसे नेतृत्व की कार्यशैली पर गंभीर समीक्षा होना जरूरी है।

बालोद में अब यह विवाद केवल एक आदेश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही, कानूनी समझ और सत्ता के इस्तेमाल पर बड़ा सवाल बन चुका है। लोग चौक चौराहों में चुटकी लेते हुए हंस हंस कर कह रहे हैं कि भविष्य में किसी भी कार्रवाई से पहले अधिकार क्षेत्र, नियम और संवैधानिक प्रक्रिया का कठोरता से पालन किया जाए, ताकि प्रशासन न्यायालय की फटकार और जनता की नाराजगी का कारण न बने।

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