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सुशासन सप्ताह में ‘प्रशासन गांव की ओर’ सनौद में उम्मीदों और सवालों का आमना-सामना

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में सुशासन सप्ताह के अंतर्गत 24 दिसंबर को ग्राम पंचायत सनौद, विकासखंड गुरूर, जिला बालोद (छत्तीसगढ़) में “प्रशासन गांव की ओर” विशेष कार्यक्रम का आयोजन हुआ। उद्देश्य स्पष्ट था जनसमस्याओं को गांव में ही सुनना, समाधान की दिशा तय करना और शासन-प्रशासन की पहुंच को जमीनी स्तर तक मजबूत करना। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ग्रामीणों की भागीदारी दिखी, जिससे एक ओर उम्मीद जगी तो दूसरी ओर कई सवाल भी उभरे।

सकारात्मक पहलू

प्रशासन की टीम ने मौके पर ही आवेदन स्वीकार किए, कुछ मामलों में त्वरित निराकरण भी किया। राशन, पेंशन, आवास, बिजली, जलापूर्ति और राजस्व से जुड़े मुद्दों पर विभागीय अधिकारियों ने सीधे संवाद किया। इससे ग्रामीणों को “दफ्तर के चक्कर” से राहत का भरोसा मिला। पारदर्शिता की दृष्टि से यह पहल सराहनीय रही कि शिकायतों का पंजीकरण सार्वजनिक रूप से हुआ और समयसीमा बताई गई। कई बुजुर्गों और महिलाओं ने इसे सुविधाजनक बताया।

नकारात्मक पहलू

हालांकि, कई शिकायतें वर्षों पुरानी थीं, जिन पर केवल आश्वासन देकर फाइलें आगे बढ़ाने की बात कही गई। कुछ विभागों की अनुपस्थिति या अपर्याप्त प्रतिनिधित्व से निराकरण अधूरा रहा। तकनीकी कारणों और संसाधन कमी का हवाला देकर कई मामलों को “अगली तारीख” पर टाल दिया गया। इससे ग्रामीणों में यह धारणा भी बनी कि कार्यक्रम प्रभावी तो है, पर क्रियान्वयन की गति धीमी है।

भाजपा की ओर से वर्जन

भाजपा की ओर से दुर्गानंद साहू, जनपद उपाध्यक्ष ने कहा कि सुशासन सप्ताह ने प्रशासन और जनता के बीच दूरी कम की है। उनके अनुसार, “गांव में शिविर लगाकर समस्याएं सुनना सही दिशा में कदम है। जहां त्वरित समाधान हुआ, वहां विश्वास बढ़ा। जो प्रकरण लंबित हैं, उनके लिए समयबद्ध कार्ययोजना जरूरी है।” उन्होंने प्रशासन से अपेक्षा जताई कि फॉलो-अप की व्यवस्था मजबूत हो ताकि परिणाम दिखाई दें।

कांग्रेस की ओर से वर्जन

कांग्रेस प्रतिनिधियों ने कार्यक्रम की मंशा को स्वीकार करते हुए कहा कि जमीन पर असर तभी पड़ेगा जब घोषणाएं नहीं, ठोस कार्रवाई दिखे। उनका कहना था कि “कई शिकायतें वर्षों से लंबित हैं, जिन्हें केवल सूचीबद्ध करना पर्याप्त नहीं। जवाबदेही तय होनी चाहिए और गांव-स्तर पर समाधान की निगरानी हो।” उन्होंने नियमित शिविरों और जवाबदेह तंत्र की मांग रखी।

प्रशासनिक दृष्टि पॉजिटिव और नेगेटिव

प्रशासन की सकारात्मकता यह रही कि विभागों ने समन्वय दिखाया और शिकायतों को औपचारिक मंच मिला। नकारात्मक पक्ष यह कि संसाधन, स्टाफ और तकनीकी अड़चनों के कारण सभी मामलों का तत्काल समाधान संभव नहीं हो सका। फिर भी, प्रशासन ने समयसीमा के भीतर प्रकरण निपटाने का भरोसा दिलाया।सनौद में “प्रशासन गांव की ओर” कार्यक्रम ने संवाद का पुल बनाया—यह इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। परंतु, सुशासन की कसौटी परिणामों से तय होगी। आश्वासन से आगे बढ़कर समयबद्ध, पारदर्शी और जवाबदेह कार्रवाई ही इस पहल को सार्थक बनाएगी।

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