रॉयल्टी की रसीद से प्रकृति सुरक्षित नहीं होती परसदा तालाब के मुरूम चोरों को समझना होगा

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में थाना बालोद के अंतर्गत ग्राम पंचायत परसदा में पापरा मार्ग पर स्थित तालाब से मुरूम उत्खनन को सही ठहराने के लिए इन दिनों दलीलों की एक नई परत चढ़ाई जा रही है। कहा जा रहा है कि खनिज विभाग से रॉयल्टी जमा है, पंचायत की सहमति है और ग्रामीणों का विश्वास है कि मुरूम निकालने से तालाब में सालभर पानी बना रहेगा। पहली नजर में यह तर्क सुविधाजनक और आकर्षक प्रतीत होता है, लेकिन जब इसे पर्यावरणीय विवेक, कानूनी प्रावधानों और भविष्य की वास्तविकताओं के तराजू पर तौला जाता है, तो यह दावा खोखला और खतरनाक साबित होता है।सबसे अहम सवाल यही है कि क्या रॉयल्टी की पर्ची प्रकृति को नुकसान पहुंचाने का लाइसेंस बन सकती है? उत्तर साफ है—नहीं। रॉयल्टी केवल खनिज के व्यावसायिक दोहन का शुल्क है, न कि पर्यावरणीय अनुमति का विकल्प। जलस्रोतों से जुड़े क्षेत्रों में खनन के लिए विशेष नियम, तकनीकी स्वीकृति और वैज्ञानिक अध्ययन अनिवार्य होते हैं। तालाब जैसी संरचनाएं केवल गड्ढे नहीं होतीं, वे पूरे गांव के जल संतुलन, भूजल रिचार्ज और पारिस्थितिकी का आधार होती हैं। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में मशीनों की एंट्री को सिर्फ रसीद दिखाकर जायज ठहराना नियमों की आत्मा पर सीधा प्रहार है।ग्रामीणों और पंचायत द्वारा दिया जा रहा यह दावा कि मुरूम निकासी से तालाब अधिक गहरा होगा और पानी टिकेगा, वैज्ञानिक कसौटी पर कमजोर पड़ता है। गहराई और जल संरक्षण के बीच सीधा संबंध नहीं होता। तालाब की असली ताकत उसकी प्राकृतिक परतों, मिट्टी की संरचना और जैविक संतुलन में होती है। भारी मशीनों से की गई खुदाई इन परतों को नष्ट कर देती है, जिससे रिसाव बढ़ता है और कुछ समय बाद वही तालाब पानी सहेजने के बजाय उसे जमीन में निगलने लगता है। यह कल्पना नहीं, वर्षों के पर्यावरणीय अनुभवों का निष्कर्ष है।इस उत्खनन का एक और गंभीर पहलू है—तालाब के तटबंधों की सुरक्षा। मशीनों के दबाव से किनारे कमजोर होते हैं, ढाल बिगड़ती है और बरसात के दिनों में कटाव का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। शुरुआत में तालाब भरा हुआ दिखाई दे सकता है, लेकिन धीरे-धीरे उसका आकार, उपयोगिता और जीवन तीनों क्षीण हो जाते हैं। जो तालाब कभी पशुओं, खेतों और इंसानों की प्यास बुझाता था, वही कुछ वर्षों में खतरे का गड्ढा बन सकता है।यह भी सोचने की जरूरत है कि क्या इस पूरी प्रक्रिया से पहले कोई स्वतंत्र तकनीकी सर्वे कराया गया? क्या यह तय किया गया कि कितनी मात्रा में मुरूम निकालना सुरक्षित रहेगा? क्या पारिस्थितिकी, जलीय जीवों और आसपास के भूजल पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन हुआ? यदि इन सवालों के जवाब दस्तावेजों में मौजूद नहीं हैं, तो पूरा तर्क अनुमान, भावनाओं और जल्दबाजी पर आधारित है—योजना पर नहीं।
यह संपादकीय यह नहीं कहता कि पंचायत या ग्रामीणों की नीयत गलत है। संभव है उद्देश्य तालाब सुधार या स्थानीय जरूरतों की पूर्ति हो। लेकिन पर्यावरण से जुड़े फैसले सद्भावना से नहीं, समझदारी से लिए जाते हैं। अधूरी जानकारी पर लिया गया निर्णय आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संकट का बीज बो सकता है। तालाब को संवारने के नाम पर यदि उसका मूल अस्तित्व ही दांव पर लगा दिया गया, तो यह विकास नहीं, विनाश की पटकथा होगी।अब जिम्मेदारी प्रशासन और खनिज विभाग की है कि वे रॉयल्टी की आड़ में आंख मूंदकर खनन को हरी झंडी न दें। स्पष्ट दिशा-निर्देश, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और पारदर्शी तकनीकी जांच के बिना तालाब में किसी भी तरह की खुदाई जोखिम से भरी है। विकास और प्रकृति के बीच समझौता कभी बराबरी का नहीं होता—नुकसान हमेशा प्रकृति का होता है और कीमत गांव चुकाता है।तालाब में पानी टिकेगा या नहीं, इसका फैसला आज नहीं, आने वाले वर्षों में होगा। लेकिन यदि आज गलत कदम उठा लिया गया, तो कल पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं लगेगा। यही इस पूरे मामले की सबसे बड़ी चेतावनी और सबसे कठोर सच्चाई है।



