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मुड़खुसरा के चंद्राकर परिवार का विवाह, सामाजिक जिम्मेदारी का उत्सव जो केवल रिश्ता नहीं, संदेश भी है

 

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में ग्राम मुड़खुसरा के चंद्राकर परिवार का विवाह भारतीय समाज के महत्व में केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं होता, बल्कि यह दो परिवारों, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों का सजीव संगम होता है। यह वैवाहिक समारोह इसी भाव को गहराई से रेखांकित करता है। सौ. कं. योग्यता और चि. डॉ. आदित्य के मंगल परिणय का यह अवसर उस सामाजिक चेतना का प्रतीक है, जहाँ संस्कार, स्मृति और जिम्मेदारी एक साथ आगे बढ़ते हैं।यह आयोजन स्वर्गीय दाऊ स्व. महासिंह जी एवं स्व. जमुना देवी की स्मृतियों को नमन करते हुए आगे बढ़ता है। उनका जीवन सादगी और सामाजिक समर्पण का उदाहरण रहा। उन्हीं मूल्यों की छाया आज उनकी पौत्री सौ. कं. योग्यता के व्यक्तित्व और संस्कारों में दिखाई देती है। यह विवाह उस पीढ़ीगत उत्तरदायित्व का प्रमाण है, जहाँ पूर्वजों की सीख को वर्तमान में जीया जा रहा है।

वधू सौ. कं. योग्यता,पौत्री — स्व. दाऊ महासिंह जी एवं स्व. श्रीमती जमुना देवी चन्द्राकर, सुपुत्री — दाऊ भूषण लाल – श्रीमती ममता चन्द्राकर, प्रीतम सिंह – पुष्पा चंद्राकर  निवासी — ग्राम मुड़खुसरा, बालोद (छ.ग.)

प्रतिष्ठारत एवं मार्गदर्शक परिवारजन

दाऊ विशाल चंद्राकर (बड़े पापा), श्रीमती कुंतीदेवी (बड़ी मां),श्रीमती कुमारी देवी (बड़ी मां)बैनकुमार–निर्मला (बड़े पापा–बड़ी मां), हरप्रसाद–देवकी बाई,(बड़े पापा–बड़ी मां), श्रीमती शैल  देवी चंद्राकर — (बड़ी मां),

ये सभी परिवार के ऐसे स्तंभ हैं, जिन्होंने योग्यता के जीवन को संस्कार, अनुशासन और सामाजिक समझ से सींचा है।

ननिहाल पक्ष दाऊ तुन्ना चन्द्राकर–स्व. गौरी चन्द्राकर राधेश्याम श्रीमती शतरूपा चन्द्राकर, (नाना–नानी) राजेंद्र–हेमलता,अशोक–रंजना, प्रमोद–मेनका,विनोद–मीरा, संदीप–भूमि मामा मामी यह पक्ष उस आत्मीयता का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ रिश्ते केवल नाम नहीं, जिम्मेदारी होते हैं।

स्वागतकर्ता परिवार
दाऊ गिरिश–लक्ष्मीबाई, विरेंद्र–विजयलक्ष्मी, तोषण–विजया,
खिलावन–कमलेश्वरी, रोहित–निशा,टीकम–नेहा, नीलम–प्रतिमा, मोजेस–भूमि, पलाश–काजल परसमणि,ईश्वरदायाल, सुश्री विधि चंद्राकर

इन सभी ने आयोजन की व्यवस्था, अतिथि सत्कार और सामाजिक मर्यादा को निभाने की सामूहिक जिम्मेदारी उठाई है।

हमारे आंगन की शोभा श्रीमती निधि–विजय, , श्रीमती पूजा–पुरुषोत्तम, लोकेश–दिव्या — यह पीढ़ी परिवार की निरंतरता और आधुनिक सोच का संतुलन प्रस्तुत करती है।

दर्शनाभिलाषी एवं स्नेहिल जन

मोनिश(मोनू), मधु, रितु, हर्ष, कली, युक्ता, सोनू, खुशबू, खुशी, काजल, प्रकृति, पिंटू,पुष्कर, नैतिक, मोनेश, मोहित्ता  चंद्राकर ये नाम उस सामाजिक वृत्त का परिचय हैं, जो परिवार के साथ खड़ा है।

सामाजिक सरोकार और उद्देश्य यह विवाह समारोह केवल रस्मों तक सीमित नहीं है। यह सामूहिक सहभागिता, पारिवारिक जवाबदेही और सामाजिक समरसता का उदाहरण है। आज जब विवाह दिखावे और खर्च की होड़ बनते जा रहे हैं, यह आयोजन संतुलन, सादगी और संस्कार का संदेश देता है। हर नाम का उल्लेख यह बताता है कि परिवार समाज से कटकर नहीं, समाज के साथ मिलकर आगे बढ़ता है।स्व. दाऊ महासिंह जी और स्व. जमुना देवी की स्मृति में यह आयोजन हमें यह भी याद दिलाता है कि नई पीढ़ी की खुशियों की नींव पुराने मूल्यों पर ही टिकती है। यही इस विवाह का सबसे बड़ा उद्देश्य और सामाजिक संदेश है — रिश्ते निभें, संस्कार जिए जाएं और जिम्मेदारी साझा की जाए।

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