नगर पालिका सोती रही, वार्डवासी जागते रहे” — साधुबन तालाब की सफाई में जनता ने खुद लिखी बदलाव की इबारत

संपादक:- मीनू साहू
बालोद:- छत्तीसगढ़ के जिला मुख्यालय बालोद नगर पालिका की कार्यशैली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। वर्षों से उपेक्षा, लापरवाही और सिर्फ आश्वासनों की राजनीति झेल रहे वार्डवासियों ने आखिरकार वह कर दिखाया, जो जिम्मेदार विभागों को करना चाहिए था। साधुबन तालाब की बदहाल स्थिति से परेशान लोगों ने प्रशासन का इंतजार छोड़ खुद सफाई अभियान छेड़ दिया और यह साबित कर दिया कि जनता अब केवल शिकायत करने वाली भीड़ नहीं, बल्कि बदलाव लाने वाली ताकत बन चुकी है।
कभी इलाके की पहचान माना जाने वाला साधुबन तालाब आज गंदगी, जलकुंभी और बदबू का अड्डा बन चुका था। तालाब की हालत देखकर ऐसा लग रहा था मानो नगर पालिका ने इसे अपनी प्राथमिकताओं की सूची से पूरी तरह बाहर कर दिया हो। वार्डवासियों द्वारा कई बार शिकायतें करने, आवेदन देने और जनप्रतिनिधियों तक बात पहुंचाने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। हर बार सिर्फ आश्वासन मिला — “जल्द सफाई होगी”, “प्रस्ताव भेजा गया है”, “बजट आएगा तो काम होगा”। लेकिन जमीन पर नतीजा शून्य रहा।
आखिरकार लोगों ने तय किया कि अब वे प्रशासनिक सुस्ती का बोझ और नहीं उठाएंगे। युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं ने मिलकर तालाब की सफाई का जिम्मा अपने हाथों में ले लिया। किसी ने फावड़ा उठाया, किसी ने जलकुंभी हटाई, तो किसी ने कचरा निकालने में सहयोग किया। यह दृश्य केवल सफाई अभियान का नहीं था, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ जनता की खामोश नाराजगी का प्रतीक भी था।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब आम नागरिक बिना संसाधनों और सरकारी सहायता के तालाब की सफाई कर सकते हैं, तो फिर करोड़ों के बजट और पूरे अमले के बावजूद नगर पालिका क्यों असफल साबित हो रही है? क्या जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ बैठकों और फाइलों तक सीमित रह गए हैं? क्या जनता का काम अब जनता को ही करना होगा?
वार्डवासियों का यह कदम प्रेरणादायक जरूर है, लेकिन यह प्रशासन के लिए शर्मिंदगी का विषय भी होना चाहिए। क्योंकि जहां जनता खुद झाड़ू और फावड़ा उठाने पर मजबूर हो जाए, वहां व्यवस्था की नाकामी साफ दिखाई देती है। साधुबन तालाब की सफाई ने यह संदेश दे दिया है कि जनता अब जाग चुकी है। यदि प्रशासन जिम्मेदारी नहीं निभाएगा, तो लोग खुद बदलाव की शुरुआत करेंगे — और फिर सवाल भी पूछेंगे।



