शिक्षा व्यवस्था की शर्मनाक तस्वीर – अंडी की शाला में 85 बच्चे छोटे कक्ष में कैद, जिम्मेदारों की नींद अब भी गहरी!

बालोद :- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के डौंडीलोहारा विकासखंड के अंडी गांव से ऐसी तस्वीर सामने आई है जो शिक्षा विभाग और प्रशासन की संवेदनहीनता को बेनकाब करती है। शासन के लाख दावों के बावजूद यहां की शासकीय प्राथमिक शाला अंडी आज भी ढहते भवन और अव्यवस्था के बोझ तले कराह रही है। स्थिति इतनी भयावह है कि कक्षा 1 से लेकर 5 तक के कुल 85 नन्हे बच्चे दो कमरे में ठूंसकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। यह दृश्य किसी पिछड़े जमाने की नहीं, बल्कि “डिजिटल एजुकेशन” और “नया छत्तीसगढ़” का दावा करने वाले प्रदेश की सच्चाई है।अंडी के इस विद्यालय का भवन जर्जर हालत में है — छत टपकती है, दीवारें झरती हैं और फर्श पर मिट्टी व पानी का ढेर रहता है। बरसात में स्कूल किसी दलदल में तब्दील हो जाता है, जहां बच्चे एक कोने में सिकुड़कर बैठते हैं और शिक्षक बेमन से पढ़ाते हैं। शिक्षा का माहौल नहीं, बल्कि मानो खतरे का मैदान बन चुका है यह शाला। यह हाल तब है जब ग्राम पंचायत व गांव वालों ने बार-बार,जनपद, विधायक और जिला प्रशासन तक गुहार लगाई, लेकिन उनकी अर्जी फाइलों के ढेर में दम तोड़ती रही।प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर विभागीय जिम्मेदारों तक सबने “जल्द कार्रवाई होगी” का वही घिसा-पिटा जवाब देकर आंख मूंद रखी है। लेकिन अब हाल यह है कि बच्चों के सिर पर स्कूल की जगह खुला आसमान है और सुरक्षा की जगह खतरा मंडरा रहा है। जिन नन्हे हाथों में किताबें और कलम होनी चाहिए, वे छत से टपकते पानी से खुद को बचाने में व्यस्त हैं।यह शर्म की बात है कि शासन “सर्व शिक्षा अभियान” और “नई शाला नीति” की गूंज कर रहा है, जबकि अंडी जैसे गांवों की हकीकत उस नारे को झूठा साबित कर रही है। यहां शिक्षा नहीं, लापरवाही का पाठ पढ़ाया जा रहा है। 85 बच्चों की भीड़ दो ही कक्ष में ठूंसी जाती है — न पर्याप्त प्रकाश, न हवा, न स्थान। न कोई सुरक्षा मानक, न किसी को कोई चिंता।ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते नया भवन नहीं बना तो किसी भी दिन कोई बड़ा हादसा हो सकता है। बच्चों की जान जोखिम में है, लेकिन शासन-प्रशासन के लिए यह खबर भी बेअसर है। बच्चे मासूम स्वर में मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री से गुहार लगा रहे हैं — “सर, हमें भी एक सुरक्षित स्कूल दीजिए… हम भी पढ़ना चाहते हैं।” उनकी यह अपील पूरे प्रदेश की व्यवस्था पर सवाल उठाती है।क्या अब भी जिला प्रशासन बालोद जागेगा? क्या शासन इन मासूमों को छत के नीचे पढ़ने का हक देगा? या फिर यह 85 बच्चों की पुकार भी उस जर्जर दीवार की तरह ढह जाएगी, जो अब टूटने की कगार पर है।अंडी की शाला आज सरकार के शिक्षा तंत्र पर सबसे बड़ा सवालचिह्न है — जहां बच्चे ज्ञान नहीं, असुरक्षा के बीच भविष्य तलाश रहे हैं!



