हमर छत्तीसगढ़

दल्लीराजहरा की चमक बुझी, खदानें चलती रहीं, शहर क्यों उजड़ता गया?

आबादी घटी, उम्मीदें भी सिकुड़ीं पहाड़ खोदकर खजाना निकला, शहर के हिस्से में क्या आया?

संपादक:- मीनू साहू

बालोद :- कभी लौह अयस्क की ताकत से धड़कने वाला दल्लीराजहरा आज अपने ही वैभव के मलबे पर खड़ा नजर आता है। जिस शहर की पहचान देश के इस्पात उत्पादन से जुड़ी रही, वहां आज रोजगार, कारोबार और भविष्य को लेकर बेचैनी है। सवाल यह नहीं कि दल्लीराजहरा बदला क्यों? असली सवाल यह है कि जब बदलाव साफ दिखाई दे रहा था, तब जिम्मेदार तंत्र आंखें बंद करके क्यों बैठा रहा?

आबादी घटी, उम्मीदें भी सिकुड़ीं

2011 की जनगणना में दल्लीराजहरा की आबादी 44,363 दर्ज हुई, जबकि 2001 में यही संख्या करीब 50,884 थी। यानी एक दशक में आबादी लगभग 6,500 कम हो गई। 1991 में आबादी करीब 55,996 थी। आंकड़ों की यह गिरावट शहर के बदलते आर्थिक हालात पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

जिस शहर में कभी रोजगार की तलाश में लोग आते थे, वहां आज बेहतर अवसरों के लिए बाहर जाने की मजबूरी चर्चा का विषय है।

पहाड़ खोदकर खजाना निकला, शहर के हिस्से में क्या आया?

दल्लीराजहरा की खदानों ने भिलाई इस्पात संयंत्र को लंबे समय तक लौह अयस्क उपलब्ध कराया। पुराने सरकारी दस्तावेजों में दल्लीराजहरा की खदानों के क्षय की स्थिति का उल्लेख भी सामने आया था।

फिर सवाल उठता है—जब खदानों का भविष्य पहले से दिखाई दे रहा था, तब शहर के भविष्य की वैकल्पिक योजना क्यों नहीं बनाई गई?

खनिज खत्म होने की चिंता थी, लेकिन रोजगार के नए रास्ते तैयार करने की चिंता कितनी थी?

बीरेंद्र साहू का गंभीर आरोप

स्थानीय निवासी बीरेंद्र साहू प्रशासन और बीएसपी माइंस की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाते हैं। उनका कहना है कि प्रशासन मनमानी कर रहा है और बीएसपी माइंस के साथ मिलकर काम किया जा रहा है।

साहू के मुताबिक, “उन्हें यहां बसे लोगों से कोई मतलब नहीं है। आवाज उठाने पर बल प्रयोग कर दादागिरी की जाती है। जिला प्रशासन को बताओ तो कोई बात सुनता नहीं है।”

यदि ये आरोप सही हैं तो मामला बेहद गंभीर है। और यदि आरोप गलत हैं तो प्रशासन को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

कलेक्टर की भूमिका पर सीधा सवाल

दल्लीराजहरा के लोगों की शिकायतें आखिर किस दरवाजे पर जाएं? अगर स्थानीय नागरिक प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाने के बाद भी सुनवाई नहीं होने का आरोप लगा रहे हैं, तो जिला प्रशासन की जवाबदेही कौन तय करेगा?

कलेक्टर कार्यालय से लेकर स्थानीय प्रशासन तक सवाल पहुंच रहे हैं, लेकिन जनता को जवाब चाहिए—समस्या का समाधान कब होगा?

रेल आई, खदान चली, लेकिन शहर का भविष्य कहां है?

दल्लीराजहरा–रावघाट रेल परियोजना को क्षेत्र के विकास की बड़ी उम्मीद माना गया। मगर केवल रेल लाइन या खनन से शहर का भविष्य सुरक्षित नहीं होता। जरूरत थी उद्योग, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और निवेश का मजबूत विकल्प खड़ा करने की।

अब सवाल बचा है—दल्लीराजहरा का अगला अध्याय कौन लिखेगा?

जिस शहर ने देश को लौह अयस्क दिया, वह अपने ही भविष्य के लिए संघर्ष करे, इससे बड़ी विडंबना क्या होगी?

खदानों से निकला अयस्क देश के विकास में लगा, लेकिन दल्लीराजहरा का विकास क्यों अटक गया?

जनता जवाब मांग रही है। प्रशासन को जवाब देना होगा।

क्योंकि दल्लीराजहरा को सिर्फ उसके गौरवशाली अतीत की कहानी बनाकर छोड़ देना शहर के साथ सबसे बड़ी नाइंसाफी होगी।

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