बालोद के बिजली विभाग में मनी राम का खेल ट्रांसफर के नाम पर भ्रष्ट्राचारी मजबूर कर्मचारियों का शोषण

बालोद : छत्तीसगढ़ में बालोद के बिजली विभाग में ट्रांसफर प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगे हैं। अज्ञात सूत्रों से पता चला है कि कुछ अधिकारी मनी राम जैसे का रिश्वत लेकर पदस्थापना करवाने का काला कारोबारी चलाने का इल्जाम लगा है। बालोद में फैले इस कथित नेटवर्क ने विभाग को भ्रष्टाचार के दलदल में धकेल दिया है, जहां गरीब कर्मचारियों को दूरदराज के क्षेत्रों में भेजा जा रहा है, जबकि रिश्वत देने वालों को शहरों में आरामदायक पोस्टिंग मिल रही है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, यह सिलसिला इतना खुला हो चुका है कि कर्मचारी इसे ‘ट्रांसफर इंडस्ट्री’ कहने लगे हैं।विभाग में काम करने वाले एक वरिष्ठ लाइनमैन ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “ट्रांसफर के लिए 50 हजार से एक लाख रुपये का लेन-देन आम बात हो गई है। अगर पैसे नहीं दिए, तो जंगल-जंगल भटकना पड़ता है। यहां मेहनत नहीं, जेब की गहराई मायने रखती है।” हाल ही में विभाग के अंदर कुछ बड़ी घटना के बाद भी इस कथित गिरोह पर कोई कार्रवाई न होने से जन आक्रोश बढ़ गया है। सूत्रों का कहना है कि फाइलें पैसे के लिफाफे के साथ ही सरकती हैं और बड़े अधिकारी चुपचाप अपना हिस्सा लेते हैं।विभागीय कर्मचारियों के एक समूह ने आरोप लगाया कि मनी राम के ही सहयोग से ऊपरी अधिकारियों के साथ सांठगांठ कर यह सिलसिला चला रहे हैं। मनीराम को ही लापरवाही और भ्रष्टाचारी का प्रतीक माना जा रहा है। और तो और बिजली विभाग के किसी दुर्घटना पर शोक मनाते-मनाते ही उसके हक पर रिश्वत का सौदा हो जाता है,” एक अनाम कर्मचारी ने कहा। गरीब लाइनमैनों को 100 किलोमीटर दूर भेजा जा रहा है, जबकि ठेकेदारों के रिश्तेदार और चहेते को शहरों में मनचाही पोस्टिंग दे रहे हैं। यह असमानता विभाग की छवि को धूमिल कर रही है, जहां सेवा के बजाय वसूली का राज चल रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता मोहन निषाद ने कहा कि “ऊपर से नीचे तक साठगांठ का जाल बिछा है। न्याय की जगह लिफाफे चल रहे हैं।” हाल के दिनों में कई ट्रांसफर ऑर्डरों में रिश्वतखोरी की शिकायतें सामने आई हैं, लेकिन कोई आधिकारिक जांच शुरू नहीं हुई। सामाजिक संगठन हिंद सेना के प्रदेश संयोजक तरुण नाथ योगी ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द कार्रवाई न हुई, तो आंदोलन तेज होगा।यह मामला छत्तीसगढ़ सरकार के लिए चुनौती बन गया है, जहां बिजली विभाग को सुधारने के वादे किए गए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शी ट्रांसफर नीति और सख्त निगरानी से ही इस भ्रष्टाचार को रोका जा सकता है। संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। जनता और कर्मचारियों की नजरें अब सरकार पर टिकी हैं—क्या यह ‘भ्रष्ट सर्कस’ बंद होगा, या जारी रहेगा? विभाग की इज्जत दांव पर है, और समय जवाब मांग रहा है।



