पुलिस की छत्रछाया में फल-फूल रहा नशे का अड्डा,

“अरकर गांव का काला सच बालोद पुलिस की छत्रछाया में फल-फूल रहा नशे का अड्डा, अपराधी दिलीप कोसरे बना स्थानीय सिंडिकेट का सरगना”
रिपोर्ट — विशेष संवाददाता उत्तम साहू
बालोद:- छत्तीसगढ़ में बालोद जिले के अरकर गांव में इन दिनों नशे का कारोबार खुल्लमखुल्ला चल रहा है। दिन में शांत दिखने वाला यह गांव रात ढलते ही एक गैरकानूनी मंडी में तब्दील हो जाता है, जहां शराब और गांजा खुलेआम बेचे जाते हैं। और सबसे चौंकाने वाली बात — यह सब कुछ पुलिस थाना से कुछ दूरी पर हो रहा है।स्थानीय सूत्रों और ग्रामीणों के अनुसार, यह कारोबार पुलिस की मौन स्वीकृति और संरक्षण में चल रहा है। गांव के कई युवकों ने बताया कि “कभी-कभी रेड होती है, पर दो घंटे बाद सब फिर वैसा ही शुरू हो जाता है। पुलिस आती है, बात होती है, फिर चली जाती है। कोई गिरफ्तारी नहीं।”
मुख्य खिलाड़ी: दिलीप कोसरे
इस पूरे नेटवर्क का सरगना बताया जा रहा है दिलीप कोसरे, जो पिछले दो वर्षों से इस धंधे को व्यवस्थित रूप से चला रहा है। उसके अधीन कई स्थानीय युवक ‘डिलीवरी बॉय’ की तरह काम करते हैं, जो शराब और गांजा गांव के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचाते हैं।गांव के लोगों का आरोप है कि दिलीप कोसरे के पास “ऊपर तक पहुंच” है — यानी वह पुलिस और कुछ स्थानीय अधिकारियों को मासिक हिस्सा देता है, जिसके बदले में उसे पूरी छूट मिली हुई है।
शिकायतें दबीं, कार्रवाई ठप
गांव के कुछ जागरूक नागरिकों ने कई बार जिला पुलिस और आबकारी विभाग को शिकायतें भेजीं। कुछ शिकायतें तो RTI (सूचना के अधिकार) के तहत भी दायर की गईं। लेकिन अब तक न कोई FIR दर्ज हुई, न ही कोई प्रभावी जांच शुरू की गई।एक ग्रामीण ने नाम न छापने की शर्त पर बताया — “यहां सबको पता है कौन-कौन पैसा खा रहा है। अगर कोई खुलकर बोले तो अगले दिन धमकी मिल जाती है। पुलिस को सब पता है, पर वे खुद इसमें हिस्सेदार हैं।”
प्रशासन की चुप्पी = संरक्षण
जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालय में जब इस मामले को लेकर पूछा गया, तो सूत्रों ने बताया कि “जांच कराई जाएगी” — वही पुराना रटा हुआ जवाब। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अरकर में नशे का कारोबार दिन-ब-दिन बढ़ रहा है।कानून-व्यवस्था की इस विफलता ने बालोद पुलिस की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर एक छोटे से गांव में इतने बड़े पैमाने पर अवैध कारोबार कैसे चल रहा है, बिना किसी “ऊपरी संरक्षण” के?
जनता की मांग: उच्चस्तरीय जांच
अब ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने शासन से मांग की है कि इस पूरे नेटवर्क की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या उच्चस्तरीय कमेटी से कराई जाए, ताकि पुलिस-प्रशासन की भूमिका उजागर हो सके।अरकर गांव का यह मामला केवल एक गांव की कहानी नहीं — यह पूरे सिस्टम के पतन की निशानी है, जहां वर्दी और अपराध ने मिलकर एक समाज को जहर में डुबो दिया है।



