पलारी अस्पताल बना सरकारी झूठ का स्थायी स्मारक कागज़ों में दौड़ती 108, ज़मीन पर रेंगता सिस्टम

रिपोर्ट:- उत्तम साहू
बालोद/पलारीः – बालोद जिले के गुरूर विकासखंड अंतर्गत नगर पंचायत पलारी में स्थित आयुष्मान आरोग्य मंदिर—प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की भव्य इमारत बाहर से सरकारी सफलता की कहानी सुनाती है, लेकिन भीतर झांकते ही हकीकत ऐसा तमाचा मारती है कि पूरा स्वास्थ्य तंत्र बेनकाब हो जाता है। दीवारों पर योजनाओं के बोर्ड, समय-सारिणी के पोस्टर और 24×7 सेवाओं के दावे टंगे हैं, पर सच्चाई इन दावों का मज़ाक उड़ाती नजर आती है।कागज़ों में इस अस्पताल के नाम से 108 आपातकालीन एंबुलेंस दर्ज है। रिकॉर्ड में वाहन मौजूद है, सुविधा उपलब्ध है, और सिस्टम पूरी तरह “सक्रिय” बताया गया है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि पलारी के नाम की यह एंबुलेंस यहां खड़ी तक नहीं होती। जरूरत पड़ने पर मरीजों और परिजनों को बताया जाता है कि एंबुलेंस “कहीं बाहर गई है”। असलियत यह है कि वही एंबुलेंस गुरूर में इस्तेमाल की जा रही है, जबकि पलारी सिर्फ नाम ढो रहा है।यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी धोखाधड़ी का खुला मॉडल है। सवाल यह है कि जब पलारी अस्पताल के नाम से एंबुलेंस स्वीकृत है, तो उसका संचालन दूसरे स्थान पर किसके आदेश से हो रहा है? किस अधिकारी की मौन सहमति से एक पूरे क्षेत्र को आपातकालीन सुविधा से वंचित रखा गया है?आपात स्थिति में गर्भवती महिला, गंभीर मरीज या सड़क हादसे के घायल व्यक्ति के लिए मिनटों की कीमत जान से जुड़ी होती है। ऐसे में पलारी के ग्रामीणों को निजी साधनों, मोटरसाइकिल, ऑटो या महंगे निजी वाहनों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह मजबूरी नहीं, बल्कि प्रशासन द्वारा थोपी गई बेबसी है।फोटो में अस्पताल के समय, ओपीडी व्यवस्था और 24×7 प्रसव सुविधा की जानकारी साफ दिखाई देती है। बोर्ड दावा करता है कि सेवाएं चौबीसों घंटे उपलब्ध हैं, लेकिन बिना एंबुलेंस के ये दावे खोखले नारों से ज्यादा कुछ नहीं। आपात सेवा का सबसे मजबूत स्तंभ ही गायब हो, तो बाकी ढांचा सिर्फ दिखावा बनकर रह जाता है।यह पूरा मामला बताता है कि कैसे सरकारी योजनाएं फाइलों में सफल और ज़मीन पर विफल घोषित कर दी जाती हैं। निरीक्षण रिपोर्टों में सब कुछ दुरुस्त, लेकिन हकीकत में जनता ठगी जा रही है। जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदे बैठे हैं, और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी इस खेल को और बल दे रही है।पलारी अस्पताल आज इलाज का नहीं, बल्कि प्रशासनिक झूठ, आंकड़ों की बाजीगरी और ग्रामीणों के अधिकारों की हत्या का प्रतीक बन चुका है। जब तक एंबुलेंस वास्तव में पलारी में तैनात नहीं होती, तब तक हर आपात स्थिति प्रशासन के माथे पर लगा सवालिया निशान बनी रहेगी।अब यह सिर्फ सुविधा की मांग नहीं, बल्कि जवाबदेही की लड़ाई है—कि कागज़ों की 108 कब ज़मीन पर दौड़ेगी, या फिर सिस्टम इसी तरह लोगों की जान से खिलवाड़ करता रहेगा।



