बालोद की शिक्षा या ‘व्यवस्था’ का खेल? सवालों के घेरे में तंत्र, जवाब से दूर जिम्मेदार!”

संपादक:- मीनू साहू
बालोद:- छत्तीसगढ़ के जिला बालोद की शिक्षा व्यवस्था इस समय सिर्फ चर्चा का विषय नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की अग्निपरीक्षा बन चुकी है। और इस बहस के केंद्र में हैं जिला शिक्षा अधिकारी मधुलिका तिवारी—एक ऐसा नाम, जिसके साथ विवादों की लंबी परछाई लगातार जुड़ती जा रही है। सवाल अब व्यक्ति से बड़ा हो चुका है—सवाल है सिस्टम का, नीयत का और उस चुप्पी का जो सब कुछ देखकर भी अनदेखा कर रही है।
सामाजिक कार्यकर्ता यशवंत निषाद द्वारा उठाए गए मुद्दों ने इस पूरे प्रकरण को सड़क से विधानसभा तक पहुंचा दिया। बेमेतरा में विज्ञान सामग्री और फर्नीचर खरीदी में नियमों की अनदेखी, वित्तीय अनुशासन की धज्जियां, और पदोन्नति में कथित गड़बड़ियां—ये सब कोई छोटे आरोप नहीं हैं। सरकार ने कुछ मामलों में “आंशिक दोष” मान लिया, लेकिन बड़ा सवाल आज भी खड़ा है—आखिर पूरी कार्रवाई क्यों नहीं? और अगर दोष नहीं, तो जांच अब तक अधर में क्यों?
जांच के बीच तबादला जशपुर—और वहां भी नए विवाद। यह कोई संयोग नहीं लगता, बल्कि एक पैटर्न की तरह उभरता दिख रहा है। अब बालोद में भी वही कहानी दोहराई जा रही है—खरीदी में पारदर्शिता पर सवाल, संसाधनों के वितरण में पक्षपात के आरोप, और प्रशासनिक निर्णयों में दबाव की शिकायतें। क्या यह महज आरोप हैं, या एक गहरे तंत्र की झलक?
सबसे चौंकाने वाला पहलू है जंबूरी आयोजन के लिए जारी लगभग दस करोड़ रुपये। इतनी भारी रकम—क्या उसका पूरा हिसाब जनता के सामने है? क्या ऑडिट हुआ? क्या उपयोगिता प्रमाण पत्र सार्वजनिक है? या फिर यह भी फाइलों में दबा एक और ‘राज’ बनकर रह जाएगा?
सरकारी सेवा नियम साफ कहते हैं—जिस अधिकारी पर वित्तीय अनियमितताओं की जांच चल रही हो, उसे संवेदनशील पद पर बनाए रखना न केवल अनुचित, बल्कि जोखिम भरा है। फिर भी लगातार ऐसी पोस्टिंग—क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या जानबूझकर किया गया संरक्षण?
अब वक्त टालमटोल का नहीं है। सरकार को साफ-साफ जवाब देना होगा—या तो आरोपों को झूठा साबित कर क्लीन चिट दे, या फिर सख्त कार्रवाई कर मिसाल पेश करे। क्योंकि यह मामला अब किसी एक अधिकारी का नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की साख, सरकारी खजाने की सुरक्षा और प्रशासनिक ईमानदारी की असली परीक्षा बन चुका है।



