हमर छत्तीसगढ़

युक्तिकरण या प्रशासनिक अन्याय? एक साल से भटकते शिक्षक, जवाबदेही से बचता तंत्र!

 

संपादक:- मीनू साहू 

बालोद:- छत्तीसगढ़ में वर्ष 2024-25 के शिक्षक युक्तिकरण को शासन ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार की पहल बताया था, लेकिन एक वर्ष बाद भी हालात ऐसे हैं कि सैकड़ों शिक्षक स्वयं को व्यवस्था के शिकार के रूप में देख रहे हैं। शिक्षक संगठनों का आरोप है कि जिस प्रक्रिया को संतुलन और गुणवत्ता बढ़ाने का माध्यम बताया गया था, वही आज असंतोष, अव्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनहीनता का प्रतीक बन चुकी है।

शिक्षकों का कहना है कि पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल पारदर्शिता पर खड़ा हुआ है। आरोप हैं कि रिक्त पदों की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई, वरिष्ठता के सिद्धांतों को दरकिनार किया गया और अनेक शिक्षकों को उनकी परिस्थितियों की अनदेखी करते हुए दूरस्थ क्षेत्रों की ओर धकेल दिया गया। यदि प्रक्रिया निष्पक्ष थी तो फिर इतने बड़े पैमाने पर आपत्तियां और न्यायालय की शरण लेने की नौबत क्यों आई—यह प्रश्न लगातार उठ रहा है।शिक्षक संगठनों के अनुसार स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि युक्तिकरण लागू होने के लगभग एक वर्ष बाद भी 200 से अधिक शिक्षक नियमित रूप से कार्यभार ग्रहण नहीं कर पाए हैं। यह केवल प्रशासनिक देरी नहीं बल्कि व्यवस्था की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल है। एक ओर सरकार शिक्षा सुधार के दावे करती है, दूसरी ओर शिक्षक अपने अधिकार, वेतन और स्थायित्व के लिए दर-दर भटकने को मजबूर बताए जा रहे हैं।

आरोप यह भी हैं कि प्रभावशाली लोगों से जुड़े कुछ मामलों में आदेशों में संशोधन हुआ, जबकि सामान्य शिक्षक लगातार अनिश्चितता के दौर से गुजरते रहे। यदि यह आरोप सही हैं तो यह समान अवसर और निष्पक्ष प्रशासन की अवधारणा पर सीधा आघात माना जाएगा। यही कारण है कि प्रभावित पक्षों में रोष लगातार बढ़ रहा है।इस विवाद का असर केवल शिक्षकों तक सीमित नहीं है। परिवार आर्थिक दबाव, मानसिक तनाव और भविष्य की चिंता से जूझ रहे हैं। कई लोगों के सामने बच्चों की पढ़ाई, पारिवारिक जिम्मेदारियों और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना चुनौती बन गया है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस लंबी प्रतीक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?

शिक्षक संगठन अब पूरे प्रकरण की स्वतंत्र न्यायिक जांच, लंबित वेतन के भुगतान, कार्यभार ग्रहण की तत्काल व्यवस्था और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक इस विवाद का पारदर्शी और न्यायपूर्ण समाधान नहीं होगा, तब तक युक्तिकरण शिक्षा सुधार की उपलब्धि नहीं बल्कि प्रशासनिक विफलता और संवेदनहीन निर्णय प्रक्रिया के उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा।

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