संपादक :- मीनू साहू
बालोद: छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में डौंडीलोहारा विकासखंड अंतर्गत तुएगोंदी क्षेत्र से जुड़े विवाद ने जिस तरह कलेक्ट्रेट परिसर तक उग्र रूप धारण किया, उसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। सर्व आदिवासी समाज का प्रदर्शन केवल एक सामान्य विरोध नहीं था, बल्कि लंबे समय से जमा असंतोष का खुला विस्फोट दिखाई दिया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई कि हजारों लोगों का आक्रोश सुरक्षा व्यवस्थाओं को ध्वस्त करते हुए सीधे कलेक्ट्रेट परिसर तक पहुंच गया?प्रदर्शनकारियों द्वारा बैरिकेडिंग तोड़ना और परिसर में प्रवेश करना निश्चित रूप से चिंताजनक घटना है, लेकिन इसके साथ ही प्रशासन की संवादहीनता भी चर्चा के केंद्र में है। जब किसी संवेदनशील मुद्दे पर बड़ी संख्या में लोग न्याय और सुनवाई की अपेक्षा लेकर पहुंचें, तब जिम्मेदार अधिकारियों की प्राथमिकता हालात को शांतिपूर्ण संवाद के माध्यम से नियंत्रित करना होनी चाहिए। यदि दिनभर प्रदर्शन जारी रहने के बाद भी शीर्ष प्रशासनिक नेतृत्व सामने नहीं आता, तो स्वाभाविक रूप से नाराजगी और बढ़ती है।कलेक्ट्रेट परिसर में महिलाओं और पुरुषों का चूल्हा जलाकर भोजन बनाना केवल धरने का दृश्य नहीं था, बल्कि यह व्यवस्था के प्रति गहरे अविश्वास का प्रतीक बनकर उभरा। यह तस्वीर बताती है कि प्रदर्शनकारी केवल ज्ञापन सौंपने नहीं आए थे, बल्कि वे अपनी बात सुने जाने तक डटे रहने का मन बना चुके थे। ऐसे में प्रशासन की रणनीति और निर्णय क्षमता दोनों पर सवाल उठना लाजिमी है।जनता यह जानना चाहती है कि यदि मामला इतना संवेदनशील था तो समय रहते प्रभावी पहल क्यों नहीं की गई? आखिर वह कौन सी वजह रही कि विवाद समाधान के बजाय टकराव की स्थिति तक पहुंच गया? क्या प्रशासन ने जमीनी स्तर पर संवाद स्थापित करने में चूक की? क्या लोगों की आशंकाओं और मांगों को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया?बालोद में सामने आया यह घटनाक्रम केवल एक विरोध प्रदर्शन की कहानी नहीं है, बल्कि प्रशासन और जनता के बीच बढ़ती दूरी का संकेत भी माना जा रहा है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद का स्थान टकराव नहीं ले सकता। यदि जनभावनाओं को समय पर समझने और संबोधित करने में विफलता होती है, तो उसके परिणाम इसी प्रकार के असाधारण और चिंताजनक दृश्यों के रूप में सामने आते हैं। आज बालोद में उठे सवालों का जवाब प्रशासन को देना ही होगा, क्योंकि मौन से विवाद समाप्त नहीं होते, बल्कि और गहरे होते जाते हैं।
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