हमर छत्तीसगढ़

धरती कराह रही है, लेकिन सत्ता और समाज की संवेदनाएं क्यों मौन हैं?

 

संपादक :- मीनू साहू 

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में डौंडीलोहारा निवासी पर्यावरण के प्रति सजग युवा भाजपा नेता धर्मेंद्र निषाद ने वर्तमान परिस्थितियों पर गंभीर मंथन करते हुए कहा कि आधुनिकता की चमक में प्राकृतिक विरासत को जिस निर्ममता से नष्ट किया जा रहा है, वह सभ्य समाज के लिए शर्मनाक विषय बन चुका है। चारों ओर संसाधनों की लूट, हरित क्षेत्रों का संकुचन और पारिस्थितिक संतुलन के साथ खिलवाड़ की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन जिम्मेदार तंत्र की निष्क्रियता चिंता को और गहरा कर रही है।

उन्होंने कहा कि सुविधाओं की अंधी प्रतिस्पर्धा ने इंसान को इतना स्वार्थी बना दिया है कि उसे अपने अस्तित्व की आधारशिला तक दिखाई नहीं दे रही। वन संपदा उजाड़ी जा रही है, जैव विविधता समाप्त हो रही है, जलधाराएं दम तोड़ रही हैं और वातावरण जहरीले तत्वों से भरता जा रहा है। इसके बावजूद विकास के नाम पर विनाशकारी गतिविधियों को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

धर्मेंद्र निषाद ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि प्रकृति को केवल दोहन की वस्तु समझने वाली मानसिकता भविष्य के लिए भयावह परिस्थितियां तैयार कर रही है। भूमि की उर्वरता घट रही है, तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है, जीव-जंतु विलुप्ति के कगार पर पहुंच रहे हैं और मौसम की अनिश्चितता किसानों से लेकर आम नागरिकों तक सभी के जीवन को प्रभावित कर रही है। यह केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट का भी संकेत है।
उन्होंने कहा कि बड़े-बड़े दावे करने वाले लोग संरक्षण की बात तो करते हैं, लेकिन धरातल पर तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। योजनाएं कागजों में सीमित हैं, संकल्प मंचों तक कैद हैं और जागरूकता केवल आयोजनों की औपचारिकता बनकर रह गई है। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में प्राकृतिक आपदाएं और अधिक भयावह रूप धारण कर सकती हैं।

धर्मेंद्र निषाद ने कहा कि मानवता को यह समझना होगा कि प्रकृति के साथ संघर्ष करके कोई भी समाज लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। पृथ्वी कोई असीमित भंडार नहीं है, जिसकी संपदा को अनवरत लूटा जाता रहे। संसाधनों के प्रति जिम्मेदार दृष्टिकोण, संरक्षण की ठोस नीति और जनसहभागिता ही समाधान का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।उन्होंने युवाओं, सामाजिक संगठनों तथा नीति-निर्माताओं से सामूहिक पहल का आह्वान करते हुए कहा कि अब चेतना, प्रतिबद्धता और सक्रियता का समय है। यदि आज भी उदासीनता बनी रही तो आने वाली पीढ़ियां वर्तमान पीढ़ी को उस वर्ग के रूप में याद करेंगी जिसने अपने स्वार्थ के लिए धरती की प्राकृतिक धरोहर को संकट में डाल दिया।

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