सागौन की सिसकियां और सत्ता की चुप्पी नलपानी वन प्रकरण में जवाबदेही से आखिर कौन भाग रहा है?

संपादक:- मीनू साहू
बालोद:- छत्तीसगढ़ में बालोद जिले के डौंडीलोहारा क्षेत्र का नलपानी वन क्षेत्र इन दिनों गंभीर चर्चाओं और जनसवालों के केंद्र में है। “मालिक मकबूजा” की आड़ में सागौन वृक्षों की कटाई को लेकर उठ रहे प्रश्न अब केवल स्थानीय बहस तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वन संरक्षण, प्रशासनिक निगरानी और सार्वजनिक जवाबदेही पर भी बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर रहे हैं।
ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों के बीच सबसे बड़ी जिज्ञासा यह है कि आखिर इतनी मूल्यवान वन संपदा से जुड़े कार्य किस प्रक्रिया के तहत संचालित किए गए। यदि सभी कदम विधिसम्मत थे, तो फिर गोपनीयता, भ्रम और विरोधाभासी चर्चाओं का वातावरण क्यों निर्मित हुआ? यदि अनुमति प्रदान की गई थी, तो उसकी शर्तें क्या थीं, निरीक्षण किसने किया और निर्धारित मानकों का पालन किस प्रकार सुनिश्चित किया गया?
पूरे घटनाक्रम ने कई असहज प्रश्नों को जन्म दिया है। क्या संबंधित विभागों ने समय रहते प्रभावी निगरानी की? क्या स्थल निरीक्षण नियमित रूप से हुए? क्या अभिलेख और वास्तविक स्थिति एक-दूसरे से मेल खाते हैं? इन बिंदुओं पर अब तक स्पष्ट और सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आने से संदेह और गहरा रहा है।
क्षेत्र में कुछ लोगों द्वारा ठेकेदार खलील के नाम का उल्लेख किया जा रहा है, किंतु किसी भी व्यक्ति की भूमिका को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं हुआ है। इसलिए आवश्यक है कि किसी भी नाम या पक्ष पर अंतिम टिप्पणी करने के बजाय निष्पक्ष जांच के माध्यम से तथ्य स्थापित किए जाएं। दस्तावेजों, स्वीकृतियों, सीमांकन, परिवहन अनुमति और संपूर्ण प्रक्रिया की स्वतंत्र पड़ताल ही वास्तविक स्थिति उजागर कर सकती है।सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े मामलों में पारदर्शिता का अभाव जनविश्वास को कमजोर करता है। जंगल केवल लकड़ी का भंडार नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों की धरोहर हैं। यदि कहीं प्रशासनिक चूक, प्रक्रियात्मक लापरवाही अथवा नियमों की अनदेखी हुई है, तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
आज जनता किसी पूर्वाग्रह या राजनीतिक शोर से अधिक स्पष्ट उत्तर चाहती है। नलपानी वन प्रकरण में सच क्या है, जिम्मेदार कौन हैं, और भविष्य में ऐसी स्थितियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे—इन प्रश्नों का समाधान केवल निष्पक्ष जांच, पारदर्शी कार्यवाही और सार्वजनिक जवाबदेही से ही संभव है। जब तक तथ्य पूरी तरह सामने नहीं आते, तब तक उठते सवाल वन क्षेत्र की खामोशी से कहीं अधिक मुखर बने रहेंगे।



