हमर छत्तीसगढ़

पलारी में भाजपा की पराजय का सबसे बड़ा कारण बना कार्यकर्ताओं का मोहभंग, संगठनात्मक अहंकार ने डुबोई चुनावी नैया

 

रिपोर्टर :- उत्तम साहू 

बालोद :- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले की नवगठित नगर पंचायत पलारी के चुनाव परिणाम ने भाजपा संगठन के भीतर कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस चुनाव को भाजपा अपने पक्ष में मानकर चल रही थी, वहीं जनता के फैसले ने पार्टी की रणनीति, संगठनात्मक कार्यशैली और नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा तेजी से हो रही है कि पलारी में भाजपा की हार किसी एक दिन की घटना नहीं, बल्कि लंबे समय से पनप रही संगठनात्मक उपेक्षा और कार्यकर्ताओं की नाराजगी का परिणाम है।

स्थानीय स्तर पर वर्षों से पार्टी का झंडा उठाने वाले कार्यकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव के दौरान उन्हें केवल भीड़ जुटाने तक सीमित कर दिया गया, जबकि निर्णय लेने की प्रक्रिया कुछ चुनिंदा चेहरों तक सिमट गई। बूथ स्तर पर मेहनत करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं को न तो महत्व दिया गया और न ही उनकी राय को गंभीरता से लिया गया। यही कारण रहा कि चुनावी मैदान में भाजपा का पारंपरिक जनाधार अपेक्षित मजबूती के साथ दिखाई नहीं दिया।जानकारों का मानना है कि किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत उसके जमीनी कार्यकर्ता होते हैं। जब वही कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित, असम्मानित और हाशिए पर महसूस करने लगें, तब संगठन की नींव कमजोर होना स्वाभाविक है। पलारी चुनाव में यही तस्वीर देखने को मिली। कार्यकर्ताओं के भीतर उत्साह की जगह निराशा और असंतोष ने घर कर लिया, जिसका सीधा असर चुनावी परिणामों पर पड़ा।कई भाजपा समर्थक भी अब खुलकर यह स्वीकार कर रहे हैं कि संगठन के कुछ पदाधिकारियों और नेताओं ने कार्यकर्ताओं से संवाद बनाए रखने के बजाय दूरी बढ़ा ली। संगठन में बढ़ती गुटबाजी, सीमित लोगों की पकड़ और समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी ने भाजपा की चुनावी मशीनरी को भीतर से कमजोर कर दिया। दूसरी ओर कांग्रेस ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए जमीनी स्तर पर बेहतर तालमेल और सक्रियता दिखाई।

पलारी का जनादेश केवल हार-जीत का परिणाम नहीं है, बल्कि भाजपा संगठन के लिए एक स्पष्ट चेतावनी भी है। यदि कार्यकर्ताओं के सम्मान, सहभागिता और सुझावों को महत्व नहीं दिया गया, तो यह असंतोष भविष्य में और बड़े राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकता है। अब सवाल यह नहीं है कि भाजपा पलारी क्यों हारी, बल्कि सवाल यह है कि क्या संगठन इस जनादेश से सबक लेकर कार्यकर्ताओं का खोया विश्वास वापस हासिल कर पाएगा या फिर उपेक्षा की यही राजनीति आगे भी चुनावी झटकों का कारण बनती रहेगी।

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