परिणाम अटका, जवाब गायब क्या बालोद शिक्षा विभाग फिर दोहरा रहा पुरानी लापरवाही की कहानी?

संपादक :- मीनू साहू
बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में आठवीं बोर्ड परीक्षा के लंबित परिणामों ने एक बार फिर शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। विद्यार्थियों और अभिभावकों की बढ़ती बेचैनी के बीच विभागीय खामोशी कई गंभीर प्रश्न खड़े कर रही है। जिस संस्था पर बच्चों के शैक्षणिक भविष्य की जिम्मेदारी है, वही आज अनिश्चितता और भ्रम का वातावरण निर्मित करती दिखाई दे रही है।
विडंबना यह है कि यह पहला अवसर नहीं है जब शिक्षा व्यवस्था की सुस्ती चर्चा का विषय बनी हो। जिले के शैक्षणिक परिणाम पहले भी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहे हैं। लगातार कमजोर प्रदर्शन को लेकर चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं, लेकिन सुधारात्मक पहल के बजाय व्यवस्थागत शिथिलता के आरोप बार-बार सामने आते रहे हैं। यदि परिणाम सुधारने पर गंभीरता दिखाई जाती, निगरानी मजबूत होती और जवाबदेही तय होती, तो शायद जिले की शैक्षणिक स्थिति इतनी चिंताजनक नहीं होती।
आज हालत यह है कि जिन विद्यार्थियों ने पूरे वर्ष मेहनत की, वे अपने परिणाम के लिए भटक रहे हैं। प्रवेश प्रक्रिया प्रभावित हो रही है, आगे की पढ़ाई की योजनाएं अधर में हैं और अभिभावकों की चिंता बढ़ती जा रही है। दूसरी ओर विभागीय तंत्र की चुप्पी यह संदेश दे रही है मानो बच्चों का भविष्य कोई प्राथमिक विषय ही न हो।
विडंबना यह है कि विद्यालयों में बच्चों को समय का महत्व, अनुशासन और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। देर से आने पर छात्र को दंड मिलता है, कार्य अधूरा रहने पर अंक कटते हैं, लेकिन जब पूरी व्यवस्था समयसीमा का पालन न करे तो उसके लिए कौन उत्तरदायी होगा? क्या जवाबदेही केवल विद्यार्थियों के लिए आरक्षित है?
बालोद जिले में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। बोर्ड परीक्षाओं में अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। ऐसे में यदि परिणाम जारी करने जैसी बुनियादी प्रक्रिया भी समय पर पूरी नहीं हो पा रही है, तो स्वाभाविक है कि लोगों का भरोसा डगमगाएगा। शिक्षा विभाग को यह समझना होगा कि परिणाम केवल आंकड़े नहीं होते, बल्कि हजारों विद्यार्थियों की मेहनत, उम्मीद और भविष्य का प्रतिबिंब होते हैं।अब आवश्यकता बयानबाजी की नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की है। लंबित परिणाम तत्काल जारी हों, देरी के कारण सार्वजनिक किए जाएं और यह स्पष्ट किया जाए कि इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है।
बालोद के विद्यार्थी आज एक ही सवाल पूछ रहे हैं—
जब शिक्षा विभाग अपनी जिम्मेदारी समय पर नहीं निभा पा रहा, तो बच्चों से उत्कृष्ट परिणामों की अपेक्षा किस नैतिक आधार पर की जा रही है?भविष्य इंतजार नहीं करता, लेकिन व्यवस्था शायद अब भी समय को हल्के में लेने की पुरानी आदत छोड़ने को तैयार नहीं दिख रही।



