हमर छत्तीसगढ़

बालोद के रायपुरा में 1009 हेक्टेयर का रणनीतिक खनिज ब्लॉक, 12 गांवों तक पहुंचने की आशंका

देश के खाद-सीमेंट उद्योग के लिए खजाना, ग्रामीणों के लिए कितनी बड़ी कीमत?

संपादक:- मीनू साहू 

बालोद। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के डौंडीलोहारा क्षेत्र का रायपुरा गांव अब स्थानीय नक्शे से निकलकर देश की रणनीतिक खनिज नीति के केंद्र में आ गया है। केंद्र सरकार द्वारा क्रिटिकल एवं स्ट्रेटेजिक मिनरल ब्लॉकों की नीलामी में एनएलसी इंडिया लिमिटेड को रायपुरा फॉस्फोराइट एवं लाइमस्टोन ब्लॉक का पसंदीदा बोलीदाता घोषित किया गया था। इसके बाद रायपुरा ब्लॉक में विस्तृत भू-वैज्ञानिक खोज की प्रक्रिया आगे बढ़ी। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार इस ब्लॉक का क्षेत्रफल करीब 1009.36 हेक्टेयर है।

मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां मिलने वाला खनिज केवल पत्थर या जमीन के नीचे दबा सामान्य संसाधन नहीं है। इसमें मौजूद फॉस्फोराइट यानी रॉक फॉस्फेट कृषि और देश की खाद सुरक्षा से सीधे जुड़ा खनिज है। भारतीय खान ब्यूरो के अनुसार दुनिया में निकाले जाने वाले अधिकांश फॉस्फेट रॉक का उपयोग फॉस्फेट उर्वरक बनाने में होता है। इससे डीएपी, एसएसपी और फॉस्फोरिक एसिड जैसे उत्पादों के निर्माण में कच्चा माल मिलता है।

इसका सीधा संबंध देश के किसान और खाद व्यवस्था से है। भारत में फॉस्फेट आधारित उर्वरकों की मांग कृषि उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में यदि रायपुरा की जमीन से उपयोगी गुणवत्ता का फॉस्फोराइट भंडार मिलता है तो यह भारत की आयात निर्भरता घटाने और घरेलू खनिज संसाधनों को मजबूत करने की राष्ट्रीय रणनीति में योगदान दे सकता है।

दूसरी तरफ लाइमस्टोन यानी चूना पत्थर की उपयोगिता भी व्यापक है। भारतीय खान ब्यूरो के अनुसार इसका सबसे प्रमुख इस्तेमाल सीमेंट उद्योग में होता है। इसके अलावा इस्पात, कागज, रसायन, चीनी, कांच, फाउंड्री और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में भी इसका उपयोग किया जाता है। छत्तीसगढ़ के रायपुर और दुर्ग क्षेत्र का लाइमस्टोन इस्पात उद्योग के लिए भी उपयोगी बताया गया है।

यानी रायपुरा से मिलने वाला संभावित खनिज देश के खाद, कृषि, सीमेंट, इस्पात और औद्योगिक उत्पादन से जुड़ सकता है। यही वजह है कि इस ब्लॉक को केवल बालोद की स्थानीय खदान मानना राष्ट्रीय तस्वीर को छोटा करके देखने जैसा होगा।

लेकिन राष्ट्रीय उपयोगिता के साथ स्थानीय सवाल भी उतने ही बड़े हैं।

डौंडीलोहारा के रायपुरा गांव में खनिज परियोजना को लेकर ग्रामीणों के बीच यह चिंता सामने आ रही है कि परियोजना का प्रभाव आसपास के करीब 12 गांवों तक पहुंच सकता है और भविष्य में इन गांवों की जमीन को भी परियोजना की जरूरतों के दायरे में लिया जा सकता है। उपलब्ध आधिकारिक नीलामी रिकॉर्ड में इन सभी 12 गांवों के नाम की पुष्टि नहीं होती। इसलिए प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वास्तविक अन्वेषण सीमा कहां तक है और भविष्य में संभावित खनन क्षेत्र में कौन-कौन से गांव प्रभावित हो सकते हैं।

यही इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू है।
एक तरफ देश को फॉस्फोराइट चाहिए ताकि कृषि के लिए जरूरी फॉस्फेट उर्वरकों की उपलब्धता मजबूत हो। देश को लाइमस्टोन चाहिए ताकि सीमेंट और इस्पात जैसे आधारभूत उद्योगों को कच्चा माल मिले। दूसरी तरफ जिन गांवों की जमीन के नीचे यह संपदा मौजूद है, वहां के किसानों के लिए जमीन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं बल्कि आजीविका, पहचान और पीढ़ियों की विरासत है।

इसलिए सरकार को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि बालोद से राष्ट्रीय विकास के लिए खनिज निकलेगा। यह भी बताना होगा कि रायपुरा और आसपास के ग्रामीणों को इस विकास में उनका हिस्सा क्या मिलेगा।

कितने स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा? कितने परिवार प्रभावित हो सकते हैं? जमीन का मुआवजा किस आधार पर तय होगा? कृषि और जलस्रोतों पर क्या असर पड़ेगा? पर्यावरणीय अध्ययन किस स्तर पर होगा? यदि भविष्य में खनन शुरू होता है तो विस्थापन और पुनर्वास की नीति क्या होगी? इन सवालों के जवाब पहले से सार्वजनिक होना जरूरी है।

विशेषज्ञों के लिए यह परियोजना भू-वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकती है, उद्योगों के लिए कच्चे माल का स्रोत और देश के लिए रणनीतिक खनिज सुरक्षा का हिस्सा। लेकिन ग्रामीणों के लिए यह उनकी जमीन और भविष्य का सवाल है।

इसलिए रायपुरा में असली परीक्षा सिर्फ यह नहीं है कि जमीन के नीचे कितना फॉस्फोराइट और लाइमस्टोन है। असली परीक्षा यह है कि उस खनिज की राष्ट्रीय उपयोगिता और स्थानीय अधिकारों के बीच सरकार कितना न्यायपूर्ण संतुलन बना पाती है।

यदि रायपुरा की धरती से निकलने वाला फॉस्फोराइट देश के खेतों तक खाद पहुंचाता है और लाइमस्टोन देश के सीमेंट तथा इस्पात उद्योग को मजबूती देता है, तो बालोद राष्ट्रीय विकास में बड़ी भूमिका निभा सकता है। लेकिन इस विकास की पहली शर्त यही होनी चाहिए कि रायपुरा और आसपास के गांवों के किसानों की जमीन, पानी, पर्यावरण और भविष्य की कीमत पर राष्ट्रीय प्रगति का मॉडल तैयार न हो।

बालोद की जमीन राष्ट्रीय संपदा है, लेकिन उस जमीन पर रहने वाला ग्रामीण भी इस कहानी का बराबर का हिस्सेदार है—अब सरकार को यह साबित करना होगा कि खनिज निकलेगा तो विकास भी गांव तक पहुंचेगा।

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