हमर छत्तीसगढ़

वरिष्ठ पत्रकार श्याम भोजवानी की आवाज—तिरंगा ऊंचा है, मगर कलम का संघर्ष अभी बाकी है!

रायगढ़ से उठता सवाल—लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को सिर्फ सम्मान नहीं, अधिकार और श्रम का मूल्य भी चाहिए

संपादक:- मीनू साहू 

रायगढ़/घरघोड़ा। स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा जब आसमान में शान से लहराता है, तो पूरा देश स्वतंत्रता और लोकतंत्र की शक्ति को नमन करता है। सरकारी कार्यालयों में ध्वजारोहण होता है, राष्ट्रगान गूंजता है और मंचों से आजादी के गौरव की बातें होती हैं। लेकिन इसी लोकतंत्र की जमीन पर एक ऐसा सवाल भी खड़ा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता—जो पत्रकार जनता के अधिकारों के लिए आवाज उठाता है, उसके अपने अधिकारों की आवाज कौन उठाएगा?

स्थानीय पत्रकारिता लोकतंत्र की सबसे निचली लेकिन सबसे मजबूत कड़ी है। रायगढ़ जैसे विस्तृत जिले में पत्रकार को खबर के लिए केवल कार्यालय की चारदीवारी में बैठना नहीं पड़ता। उसे गांवों की पगडंडियों से लेकर दूरस्थ इलाकों तक जाना पड़ता है। कभी सड़क की बदहाली सामने आती है, कभी अस्पताल की अव्यवस्था, कभी स्कूल की समस्या तो कभी सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की हकीकत।

पत्रकार इन समस्याओं को केवल दर्ज नहीं करता, बल्कि संबंधित विभाग और जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाता है। कई बार किसी खबर के बाद प्रशासन हरकत में आता है, जांच होती है और समाधान की प्रक्रिया शुरू होती है। यही पत्रकारिता की वास्तविक ताकत है।

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के पीछे पत्रकार का अपना संघर्ष भी है। पेट्रोल का खर्च, मोबाइल और इंटरनेट का बिल, कैमरा और अन्य उपकरणों की जरूरत, लगातार यात्रा और घंटों की मेहनत—इन सबकी कीमत कौन चुकाता है? अक्सर खबर जनता की होती है, लेकिन उसे जनता तक पहुंचाने की लागत पत्रकार स्वयं उठाता है।

इसी गंभीर विषय पर वरिष्ठ पत्रकार श्याम भोजवानी ने पत्रकार हित में स्पष्ट और महत्वपूर्ण बात रखी है। उनका कहना है कि पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, तो इस स्तंभ को मजबूत रखने की जिम्मेदारी भी समाज और व्यवस्था की है। पत्रकार से ईमानदारी, निष्पक्षता और जनहित की अपेक्षा की जाती है, लेकिन उसके समय, संसाधन और मेहनत को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार श्याम भोजवानी के अनुसार पत्रकार को किसी की कृपा या एहसान नहीं चाहिए। उसे अपने काम के प्रति सम्मान, अपने वैध अधिकारों की सुरक्षा और उसके श्रम की उचित मान्यता चाहिए। उनका कहना है कि मंच पर माला पहनाकर सम्मान करने से पत्रकार के संघर्ष की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। वास्तविक सम्मान तब होगा, जब पत्रकार के काम की परिस्थितियों को समझा जाए और उसके हितों पर गंभीरता से विचार किया जाए।

यह मुद्दा किसी एक व्यक्ति या संस्था तक सीमित नहीं है। यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे से जुड़ा प्रश्न है। यदि पत्रकार व्यवस्था से सवाल पूछता है, तो व्यवस्था को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि सवाल पूछने वाला व्यक्ति अपने अधिकारों के लिए दर-दर न भटके।

आजादी का अर्थ केवल बोलने की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि निर्भीक होकर सच कहने वाले व्यक्ति के सम्मान की रक्षा भी है।

इसलिए स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे को सलाम करते हुए एक संकल्प और होना चाहिए—जनता की आवाज बनने वाली पत्रकारिता को कमजोर नहीं होने दिया जाएगा।

क्योंकि जिस कलम से सड़क, स्कूल, अस्पताल, भ्रष्टाचार, प्रशासन और जनता के अधिकारों की खबर निकलती है, वह कलम केवल कागज नहीं बदलती—वह व्यवस्था को आईना दिखाती है।

तिरंगा तभी वास्तव में ऊंचा होगा, जब उसके नीचे खड़ी हर निर्भीक कलम भी सम्मान, अधिकार और आत्मसम्मान के साथ अपना दायित्व निभा सकेगी।

कलम को सिर्फ सलाम मत कीजिए—कलम के पीछे खड़े पत्रकार के संघर्ष को भी समझिए। यही लोकतंत्र की सच्ची आजादी है।

Related Articles

Back to top button