मनमानी की वजह से बिजली तंत्र कटघरे में अन्नूटोला में विभागीय मनी राम ताराम के आदेश से बवाल

बालोद:-छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के दूरस्थ ग्राम अन्नूटोला में बिजली विभाग द्वारा जारी पत्र क्रमांक 273 दिनांक 04 सितंबर 2025 ने पूरे क्षेत्र में हड़कंप ला दिया है। ग्रामीणों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि यह नोटिस विभागीय संवाद नहीं बल्कि धमकाने जैसा फरमान प्रतीत होता है। इसी सिलसिले में स्थानीय स्तर पर तकनीकी कर्मचारियों—विशेष रूप से मनीराम तराम—की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, संबंधित महिला उपभोक्ता को 1,63,320 रुपये जमा करने का आदेश बिना जांच-विवरण, बिना अवधि, बिना तकनीकी रिपोर्ट और बिना उपभोग-विश्लेषण के थमा दिया गया। शिकायतों में कहा गया कि यह नोटिस ‘बिल’ कम और ‘दबाव’ अधिक लगता है।
जांच अंतराल पर बड़ा सवाल
ग्रामीण समाज का कहना है कि मीटर/सिस्टम की पहली जांच 21 जनवरी 2025 को हुई थी तथा दूसरी जांच के बीच लगभग आठ माह का अंतर रहा। ऐसे में पूरे 12 माह की खपत मानकर राशि निकालना तकनीकी रूप से असंगत बताया जा रहा है।
स्थानीय किसानों ने इसे अव्यवहारिक बताते हुए कहा—
“अगर आठ माह में निरीक्षण हुआ तो सालभर का बिल कैसे बन गया? यह कौन-सी गणना है?”
फसल, जलस्तर और वास्तविक उपयोग की अनदेखी?
ग्रामीणों ने बताया कि जिस अवधि के लिए बिल तैयार किया गया है, उस समय गांव के तालाब में न पानी था और न मछली। ऐसे में मत्स्य पालन से जुड़े उपकरणों का उपयोग ही संभव नहीं था।
शिकायत में यह भी कहा गया कि जिस आइटम को चोरी का उपकरण बताया गया है, वह वस्तुतः मछलियों को ऑक्सीजन देने वाली मशीनें हैं, जो उस समय उपयोग में आई ही नहीं क्योंकि तालाब में जीवित जलीय संसाधन मौजूद नहीं थे।
उपभोक्ताओं का कहना है कि बिजली विभाग की आचार संहिता के मुताबिक खपत का आकलन हमेशा वास्तविक फसल, सिंचाई की आवृत्ति और जल-उपलब्धता के आधार पर होता है। ऐसे में बिना परिस्थितियों का अध्ययन किए बनाया गया बिल नियमों की मूल भावना से अलग प्रतीत होता है।
मनीराम तराम की कार्यशैली फिर चर्चा में
अन्नूटोला का मामला कोई पहला मामला नहीं है। ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि तकनीकी अमला, विशेषकर मनीराम तराम, कई बार ऐसे आदेश जारी कर चुके हैं जिन पर पारदर्शिता को लेकर सवाल उठे हैं।
इन आरोपों में कहा गया कि:
- कई बार नोटिस उपभोक्ता से बिना विस्तृत रिपोर्ट साझा किए जारी हुए,
- विभागीय संवाद स्पष्ट नहीं रहा,
- उपभोक्ताओं को ‘सुनवाई का मौका’ नहीं मिला,
- निरीक्षण रिपोर्टें कई शिकायतों में उपलब्ध ही नहीं कराई गईं।
इन मुद्दों ने बिजली विभाग की नीतियों और मैदान स्तर पर उनके अनुपालन को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि इस पूरे मामले में उच्च अधिकारी एस.के. बंड की निगरानी व्यवस्था भी पर्याप्त रूप से सक्रिय नहीं दिखती।
स्थानीय संगठनों का कहना है कि यदि जिला और संभाग स्तर की मॉनिटरिंग प्रभावी होती, तो उपभोक्ता को इस तरह की स्थिति का सामना ही न करना पड़ता।
कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा—
“जब शिकायतें महीनों से लंबित रहती हैं और जिम्मेदार अधिकारियों तक सही तथ्य नहीं पहुँचते, तब निचले स्तर की मनमर्जी बढ़ती है। ऐसे में वरिष्ठ अधिकारियों का दायित्व और बड़ा हो जाता है।”
आचार संहिता और विभागीय प्रक्रिया की अनदेखी?
ऊर्जा विभाग की आचार संहिता स्पष्ट रूप से कहती है कि—
- किसी भी बड़े बिल या दंडात्मक आदेश से पहले उपभोक्ता को स्पष्टीकरण का अवसर देना अनिवार्य है।
- निरीक्षण रिपोर्ट, फोटोग्राफ, तकनीकी विवरण और अवधि का पूरा लेखा-जोखा लिखित रूप में देना आवश्यक है।
- आरोपित विद्युत चोरी के मामलों में उपकरण, स्थिति, प्रमाण और उपयोग की समयावधि का विस्तृत दस्तावेजी प्रमाण होना चाहिए।
- बिना अवधि, बिना गणना और बिना सबूत के कोई भी आदेश विभागीय प्रक्रिया का उल्लंघन माना जाता है।
अन्नूटोला की उपभोक्ता के मामले में ग्रामीणों का कहना है कि इन प्रावधानों में से अधिकांश का अनुपालन दिखायी नहीं देता।
ग्रामीणों की मांग — पुनः जांच और कार्रवाई
ग्रामवासियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और उपभोक्ता मंचों ने सामूहिक रूप से मांग उठाई है कि:
- स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए।
- जांच पूरी होने तक विवादित राशि की वसूली रोकी जाए।
- नोटिस से जुड़े समस्त दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएँ।
- यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदार कर्मचारियों और अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई की जाए।
अन्नूटोला का मामला केवल एक उपभोक्ता का विवाद नहीं, बल्कि यह सवाल है कि क्या बिजली विभाग का सिस्टम पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ काम कर रहा है। यदि शिकायतों में दम है, तो यह केवल एक नोटिस नहीं—व्यवस्था के क्रियान्वयन पर उठी गूंजती चेतावनी है।



