हमर छत्तीसगढ़

दुर्ग के ढ़ौर में खनन का धमाका बारूद से कांपता गांव, पर्यावरण पर भारी पड़ता मुनाफे का खेल

 

रिपोर्टर :- गोपाल निर्मलकर

दुर्ग:– छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की ग्राम पंचायत ढ़ौर इन दिनों पत्थर खदानों की अंधाधुंध खुदाई और विस्फोटों की गूंज से बेचैन है। यहां खनन का ऐसा खेल चल रहा है, जिसमें विकास के नाम पर धरती का सीना छलनी किया जा रहा है और गांव के लोग रोजाना भय और अनिश्चितता के साए में जीने को मजबूर हैं। खदानों में बारूद से किए जा रहे धमाके इतने तीव्र होते हैं कि आसपास के घरों की दीवारें तक कांप उठती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि विस्फोट के समय ऐसा लगता है मानो भूकंप आ गया हो।खनन क्षेत्र में बने विशाल गड्ढे अब प्राकृतिक संतुलन के लिए भी खतरा बनते जा रहे हैं। बरसात का पानी इनमें भरकर बड़े जलाशयों का रूप ले लेता है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। धूल के घने गुबार से हवा की गुणवत्ता लगातार गिर रही है, जिससे ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है। सांस की तकलीफ, आंखों में जलन और फसलों पर गिरती धूल अब यहां की रोजमर्रा की समस्या बन चुकी है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर खनिज विभाग के सख्त नियमों और पर्यावरणीय मानकों के बावजूद यह सब किसकी निगरानी में हो रहा है? नियम स्पष्ट कहते हैं कि ब्लास्टिंग के लिए तय सुरक्षा दूरी, सीमित मात्रा में विस्फोटक और आसपास के आबादी वाले क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करना अनिवार्य है। साथ ही खनन क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण, धूल नियंत्रण और पुनर्वनीकरण जैसी जिम्मेदारियां भी संचालकों पर तय की गई हैं। लेकिन दौर के हालात इन नियमों की खुली अनदेखी की कहानी बयान करते नजर आते हैं।ग्रामीणों के मुताबिक, बारूद के धमाकों से कई घरों में दरारें तक दिखाई देने लगी हैं। खेतों में काम कर रहे लोगों को हर समय डर बना रहता है कि अगला विस्फोट कब और कितना तेज होगा। यह सवाल अब सिर्फ खनन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि गांव की सुरक्षा, पर्यावरण और लोगों के जीवन से जुड़ गया है।विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन यदि जिम्मेदारी के साथ न किया जाए तो वही विकास विनाश में बदल जाता है। ढ़ौर का मौजूदा परिदृश्य इसी सच्चाई की चेतावनी देता दिख रहा है। अब जरूरी है कि प्रशासन और खनिज विभाग इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच करे, नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करे और ग्रामीणों को राहत दिलाने के लिए ठोस कदम उठाए।क्योंकि सवाल सिर्फ पत्थर निकालने का नहीं है, सवाल उस धरती और उन लोगों के भविष्य का है, जिनकी जिंदगी इन धमाकों की गूंज के बीच हर दिन दांव पर लग रही है।

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