हमर छत्तीसगढ़

महंगी गैस के दौर में सनौद बाजार से उठी नई आवाज़ गोबर के कंडों ने फिर जगाई पुरानी ऊर्जा की याद

 

रिपोर्टर:- उत्तम साहू 

बालोद/पलारी:- छत्तीसगढ़ में बालोद जिले के गुंडरदेही विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत सनौद बाजार से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने पूरे इलाके में चर्चा और जिज्ञासा का माहौल पैदा कर दिया है। जिस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाड़ी देशों में युद्ध जैसे हालात बनते दिखाई दे रहे हैं और पेट्रोलियम तथा रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका लगातार व्यक्त की जा रही है, ठीक उसी समय सनौद बाजार में दो स्थानीय नागरिकों ने एक अनोखी पहल कर सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।ग्राम के अजय कुर्रे और शंकर लाल कोसरे ने आधुनिक ईंधन पर बढ़ती निर्भरता के बीच परंपरागत ऊर्जा स्रोतों को फिर से जीवित करने का प्रयास शुरू किया है। दोनों ने बाजार के बीचों-बीच गाय के गोबर से तैयार किए जाने वाले “छेना” यानी कंडों की बिक्री शुरू कर दी है। यह वही पुरानी पद्धति है, जो कभी ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करती थी और रसोई से लेकर घर के चूल्हों तक इसकी उपयोगिता साबित रही है।आज जब महंगी गैस सिलेंडर आम आदमी की जेब पर बोझ बनते जा रहे हैं, ऐसे समय में यह पहल कई लोगों के लिए राहत का विकल्प बनकर उभर रही है। अजय कुर्रे और शंकर लाल कोसरे न केवल कंडों की बिक्री कर रहे हैं, बल्कि लोगों को इसके उपयोग और लाभ के बारे में भी जागरूक कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह तरीका सस्ता, सुलभ और पर्यावरण के अनुकूल है। ग्रामीणों को समझाया जा रहा है कि यदि संकट की स्थिति आती है, तो पारंपरिक संसाधन ही सबसे बड़ी ताकत साबित हो सकते हैं।सनौद बाजार में इस पहल को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुट रहे हैं। कुछ लोग इसे आर्थिक मजबूरी का प्रतीक मान रहे हैं, तो कई ग्रामीण इसे आत्मनिर्भरता की मिसाल बता रहे हैं। चर्चा यह भी है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम जिन पारंपरिक साधनों को भूल गए थे, वही आज फिर संकट के समय समाधान बनकर सामने आ रहे हैं।यह दृश्य किसी सामाजिक संदेश से कम नहीं है। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण ऊर्जा संकट की आशंका मंडरा रही है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण समाज अपनी जड़ों की ओर लौटने की तैयारी करता दिखाई दे रहा है। सनौद बाजार की यह पहल सिर्फ कंडों की बिक्री भर नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी भी है कि समय रहते विकल्प तलाशना ही समझदारी है।स्पष्ट है कि जब परिस्थितियाँ चुनौती बनकर सामने आती हैं, तब स्थानीय स्तर पर उठे छोटे-छोटे कदम भी बड़े समाधान का रास्ता दिखा सकते हैं। सनौद बाजार से उठी यह आवाज़ अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन चुकी है।

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