हमर छत्तीसगढ़

प्री-वेडिंग शो बाजी परंपरा को आघात और दिखावे की अनियंत्रित प्रवृत्ति”

बालोद:-भारतीय विवाह पद्धति सदियों से संस्कार, मर्यादा और अध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित रही है। विवाह हमारे समाज में केवल दो व्यक्तियों का साथ नहीं, बल्कि दो परिवारों का सांस्कृतिक और भावनात्मक मिलन माना जाता है। सात फेरे, सात प्रतिज्ञाएँ और सामाजिक रीति-रिवाज—इन सबका मूल उद्देश्य दांपत्य जीवन में सम्मान, निष्ठा और सदाचार को स्थापित करना है।इन्हीं मूल्यों को आज आधुनिक चमक-दमक के दौर में लगातार चुनौती मिल रही है। जिले के वरिष्ठ साहित्यकार और श्री तुलसी मानस प्रतिष्ठान छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष जगदीश देशमुख ने हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ रही प्री-वेडिंग शूट की प्रवृत्ति को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका मत है कि यह फैशन अब सांस्कृतिक विचलन, अनावश्यक खर्च और सामाजिक मर्यादाओं के क्षरण का कारण बन गया है।आज के युवा वर्ग पर बाज़ारवाद और दिखावे का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि विवाह जैसे पवित्र संस्कार को भी एक ‘ग्लैमर प्रोजेक्ट’ की तरह पेश किया जा रहा है। शादी से पहले ही विदेशी शैली के सेट, भड़कीली लोकेशन, महंगे परिधान और फिल्मी अंदाज में फोटो-वीडियो निर्माण कराना अब एक ट्रेंड की शक्ल ले चुका है। यह न केवल आर्थिक रूप से बोझिल है बल्कि हमारी सांस्कृतिक आत्मा से भी परे है।कई प्री-वेडिंग वीडियोज़ में अमर्यादित दृश्यों, बनावटी रोमांस और खुले प्रदर्शन को बेधड़क सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा है। यह प्रवृत्ति न सिर्फ व्यक्तिगत मर्यादा के खिलाफ है, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक पहचान को भी चुनौती देती है। विवाह का उद्देश्य जीवनभर की साझेदारी और जिम्मेदारी के भाव को समझना है, न कि सोशियल मीडिया की लाइमलाइट के लिए पहले से ही फिल्मी दृश्य तैयार करना।देशमुख जी का कहना है कि हमारे शास्त्रों में दांपत्य जीवन को लेकर जो शिक्षाएँ दी गई हैं, वे संयम, शुचिता और पारिवारिक मूल्यों पर आधारित हैं। किन्तु आज युवा पीढ़ी इन्हें पीछे छोड़कर  कृत्रिम आधुनिकता की राह पर चल रही है। यह न केवल गलत दिशा का संकेत है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों में भी गलत मान्यताओं को जन्म देता है।यह दिखावा समाज के हर वर्ग में एक दुष्प्रभाव छोड़ रहा है। साधारण आर्थिक स्थिति वाले परिवार भी इस फैशन से प्रभावित होकर अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करने लगे हैं। इससे सामाजिक प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या और अनावश्यक आर्थिक दबाव की स्थितियाँ बन रही हैं, जो विवाह जैसे शुभ अवसर के उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत है।वास्तविक उन्नति वही है जो परंपरा और प्रगति के बीच संतुलन बनाए रख सके। प्री-वेडिंग शूट की आड़ में जो दिखावे की दौड़ चल रही है, वह न तो सांस्कृतिक दृष्टि से उचित है और न ही सामाजिक रूप से स्वस्थ। यह आवश्यक है कि समाज इस प्रवृत्ति पर स्वयं नियंत्रण लगाए और विवाह को फिर से उसके वास्तविक स्वरूप—संस्कार, मर्यादा और पवित्रता—की ओर लौटाए।यदि हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो विवाह जैसे पवित्र संस्कार को प्रदर्शन की वस्तु बनने से बचाना होगा। भारतीयता का सौंदर्य साधारणता, सादगी और मर्यादा में है, न कि कृत्रिम रोशनी और कैमरों की चमक में।

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