सत्ता के मद में चूर नायब तहसीलदार दीपक! किया दुर्व्यवहार

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के डौंडीलोहारा ब्लॉक में नायब तहसीलदार दीपक चंद्राकर द्वारा किसानों, जनप्रतिनिधियों और यहां तक कि पत्रकारों के साथ किए गए दुर्व्यवहार ने पूरे क्षेत्र में रोष की आग भड़का दी है। जब खेतों में धान की कटाई जोरों पर हो, किसान टोकन कटवाने और धान बेचने की जद्दोजहद में दिन-रात खप रहे हों—ऐसे कठिन दौर में प्रशासन से उम्मीद संवेदनशीलता की होती है, परंतु यहां तो हालात उलट हैं। अधिकारी जनता के सेवक नहीं, बल्कि जनता पर सत्ता का डंडा झाड़ने वाले शासक की भूमिका में दिख रहे हैं।किसानों का आरोप है कि जैसे ही वे पर्चा दुरुस्ती, सीमांकन, पट्टा-पर्चा सुधार की वैध मांग लेकर तहसील कार्यालय पहुंचे, वैसे ही नायब तहसीलदार चंद्राकर ने अभद्र भाषा का उपयोग करते हुए उन्हें दफ्तर से भगा दिया। यह वही कार्य हैं जिन्हें करने के लिए किसान पूरी तरह पटवारी और तहसील कार्यालय पर निर्भर रहते हैं। फसल कट चुकी है, खेत खाली हैं और यही वह समय है जब सीमांकन व पर्चा सुधार जरूरी होता है। लेकिन इस संवेदनशील स्थिति में सहायता करने के बजाय अधिकारी का व्यवहार ऐसा रहा मानो किसान अपराधी हों और दफ्तर उसकी निजी जागीर।क्षेत्र के किसानों का कहना है कि यह पहला मामला नहीं है—चंद्राकर के दुर्व्यवहार की शिकायतें कई बार सामने आ चुकी हैं। किसानों की भाषा में कहा जाए तो “जिस दफ्तर के दरवाजे से राहत की उम्मीद थी, वहीं से अपमान मिला।’’ सत्ता के अहंकार में चूर इस तरह का व्यवहार केवल किसान नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा के साथ सीधा धोखा है।सबसे शर्मनाक तथ्य यह है कि ऐसा ही दुर्व्यवहार क्षेत्र के पत्रकारों के साथ भी किया गया था। पत्रकार, जो शासन-प्रशासन की पारदर्शिता के प्रहरी हैं, जिनका काम सच्चाई को जनता तक पहुँचाना है—यदि उन्हें भी अपमानित किया जाता है, तो यह स्पष्ट संदेश है कि प्रशासनिक मशीनरी अब जवाबदेही से बचने के लिए डराने-धमकाने की राह पर उतर चुकी है।किसानों में उबाल है—और यह उबाल जायज़ भी है। उन्होंने साफ कहा है कि नायब तहसीलदार के खिलाफ उच्चाधिकारियों से लेकर थाने तक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई जाएगी। क्योंकि किसी भी अधिकारी को कानून के ऊपर नहीं खड़ा किया जा सकता, न ही जनता को अपमानित करने का लाइसेंस दिया जा सकता है।यह घटना सिर्फ एक किसान या एक पत्रकार का मामला नहीं—यह शासन-प्रशासन की उस सोच को बेनकाब करती है जहाँ जनता की आवाज़ को दबाने की कोशिश की जाती है। यह वही समय है जब शासन को याद दिलाना होगा कि अधिकार जनता के हैं, कुर्सी जनता की है, और अधिकारी जनता के सेवक—न कि मालिक।डौंडीलोहारा की यह घटना बताती है कि अब किसान चुप नहीं बैठेगा, पत्रकार चुप नहीं रहेगा और जनता किसी भी कीमत पर अपमान स्वीकार नहीं करेगी। अब आवाज उठेगी, सख्त शब्दों में उठेगी और व्यवस्था को आईना दिखाएगी—क्योंकि यह लोकतंत्र है, किसी अधिकारी की जागीर नहीं।



