हमर छत्तीसगढ़

ग्राम चिपरा में हल्बा-हल्बी समाज का प्रेरक आयोजनआस्था, एकता और सामाजिक चेतना का सशक्त संगम शक्ति दिवस 

 

रिपोर्टर :- दिनेश कुमार नेताम

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में शक्ति दिवस 26 दिसंबर के पावन अवसर पर आदिवासी हल्बा-हल्बी समाज, ग्राम चिपरा विकासखंड डौंडी में आस्था, परंपरा और सामूहिक चेतना का ऐसा जीवंत दृश्य देखने को मिला, जिसने धार्मिक, सामाजिक और प्रशासनिक दृष्टि से एक सार्थक संदेश दिया। माँ शक्ति स्वरूपा दन्तेश्वरी माता की विधिवत पूजा-पाठ से आरंभ हुआ यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज को दिशा देने वाला एक जागरूक प्रयास बनकर उभरा।सुबह से ही ग्राम में उत्साह का वातावरण था। माँ दन्तेश्वरी की आराधना के उपरांत कलश यात्रा एवं गली भ्रमण की रैली निकाली गई, जिसमें पारंपरिक वेश-भूषा, अनुशासित पंक्तियाँ और श्रद्धा से भरे स्वर ग्राम की गलियों में गूंजते रहे। यह रैली समाज की संगठित शक्ति, सांस्कृतिक पहचान और आपसी तालमेल का प्रतीक बनी। बच्चों द्वारा प्रस्तुत गीत, संगीत, नाचा और खेलों ने आयोजन को जीवंत बना दिया। उनकी प्रस्तुतियों में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि परंपरा के प्रति सम्मान और भविष्य के प्रति आशा झलकती रही।शक्ति दिवस का मूल संदेश — “विश्वास और शक्ति, दोनों के बिना कोई महान कार्य संभव नहीं” — पूरे कार्यक्रम में व्यवहारिक रूप से दिखाई दिया। यह आयोजन यह स्पष्ट करता है कि जब आस्था को संगठनात्मक शक्ति का साथ मिलता है, तब समाज केवल पूजा नहीं करता, बल्कि अपने भविष्य का निर्माण भी करता है। यही कारण है कि यह कार्यक्रम सामाजिक समरसता के साथ-साथ प्रशासनिक चेतना का भी संकेतक बना।इस अवसर पर ग्राम चिपरा के ग्रामीण अध्यक्ष  निजाम सिंह कोसमा, सचिव  यशराम राणा, सरपंच  छतर सिंह कोमा, उपसरपंच, ग्राम पटेल  अंजोर सिंह पटेल,  उदेलाल शिवना सदाराम राणा सहित ग्राम के समस्त पांघर प्रमुख अधिकारी-कर्मचारी प्रकोष्ठ के  प्रहलाद कोसमा, मनहरण रावटे, नाथूराम शिवना, जगदीश पिस्दा, योगेश पिस्दा, सुखीतराम राणा, गिरधारीराम राणा तथा महिला पदाधिकारी श्रीमती मालती बाई, ननकी बाई, समोतिन बाई, अरुणा बाई, मिलोतीन बाई की गरिमामयी उपस्थिति रही। सभी ने सहभागिता और सहयोग के माध्यम से आयोजन को सफल बनाया।यह शक्ति दिवस आयोजन राजनीतिक या प्रशासनिक मंच नहीं था, फिर भी इसके निहितार्थ स्पष्ट थे — संगठित समाज ही सशक्त शासन की नींव बनता है। जब ग्राम स्तर पर सामूहिक जिम्मेदारी, नेतृत्व और सहभागिता दिखाई देती है, तब विकास, सुशासन और सामाजिक न्याय के रास्ते स्वतः प्रशस्त होते हैं। ग्राम चिपरा का यह प्रयास बताता है कि आदिवासी समाज केवल अपनी परंपराओं का संरक्षण ही नहीं करता, बल्कि समकालीन चुनौतियों को समझते हुए रचनात्मक भूमिका निभाने में भी सक्षम है।अंततः यह आयोजन एक संदेश छोड़ गया — शक्ति केवल बाहुबल नहीं, बल्कि विचार, विश्वास, अनुशासन और एकजुटता का नाम है। ग्राम चिपरा में मनाया गया शक्ति दिवस इसी समग्र शक्ति का प्रतीक बनकर समाज को नई ऊर्जा, नई दिशा और सार्थक उद्देश्य की ओर अग्रसर करता है।

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