हमर छत्तीसगढ़

शिक्षा के मंदिर में अपराधी का अड्डा बालोद में शिक्षक का घिनौना सच उजागर

बालोद- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में बघमरा निवासी रज्जू महिलांग उम्र 43 वर्ष जो कि प्राथमिक शाला औराभाठा में सहायक शिक्षक के पद पर पदस्थ था उस पर बालोद थाना क्षेत्र की 50 वर्षीय महिला ने शादी का झांसा देकर लगभग 8 वर्षों तक शारीरिक शोषण करने का गंभीर आरोप लगाया है। पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता बीएनएस की धारा 69 और 351(3) के तहत अपराध दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार किया और न्यायालय के आदेश पर जेल भेज दिया गया।शिक्षक का आचरण बच्चों के मन में गहरी छाप छोड़ता है। जब वही शिक्षक अपराधी साबित होता है तो शिक्षा के प्रति सम्मान और भरोसा दोनों खत्म हो जाते हैं। यह नुकसान किसी एक पीढ़ी का नहीं बल्कि पूरे समाज का है।अब केवल आरोपी को जेल भेज देना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा विभाग को कठघरे में खड़ा करना अनिवार्य है। यह तय होना चाहिए कि औराभाठा स्कूल में पदस्थ इस शिक्षक की गतिविधियों पर नजर क्यों नहीं रखी गई। विभागीय अधिकारी इतने वर्षों तक क्या करते रहे। क्या ग्रामीण स्कूल केवल वेतन वितरण केंद्र बनकर रह गए हैं।यह मामला अब केवल दुष्कर्म की एफआईआर नहीं रह गया है बल्कि यह पूरे ग्रामीण समाज शिक्षा व्यवस्था और बच्चों के भविष्य पर किया गया सीधा हमला बन चुका है। जिस स्कूल को गांव में संस्कार और सुरक्षा का केंद्र माना जाता था वहीं से ऐसा घृणित सच बाहर आना पूरे तंत्र के मुंह पर करारा तमाचा है।यह घटना केवल एक महिला के साथ किए गए अपराध तक सीमित नहीं है बल्कि यह पूरे गांव और वहां पढ़ने वाले बच्चों के मानसिक भविष्य को चोट पहुंचाने वाला मामला है। ग्रामीण परिवेश में शिक्षक केवल कर्मचारी नहीं बल्कि मार्गदर्शक और भरोसे का प्रतीक होता है। गांव के माता पिता अपने बच्चों को यह सोचकर स्कूल भेजते हैं कि वहां वे सुरक्षित रहेंगे सही संस्कार पाएंगे। लेकिन जब उसी स्कूल का शिक्षक इस तरह का अपराधी निकलता है तो यह विश्वास पूरी तरह चकनाचूर हो जाता है।सबसे बड़ा और खतरनाक सवाल यह है कि प्राथमिक शाला औराभाठा जैसे स्कूल में ऐसा व्यक्ति कैसे पढ़ाता रहा। क्या शिक्षा विभाग ने कभी उसके आचरण पर नजर डाली। क्या ग्रामीण स्कूलों में नियुक्त शिक्षकों के चरित्र सत्यापन को केवल औपचारिकता बना दिया गया है। आठ वर्षों तक शोषण चलता रहा और न शिक्षा विभाग को भनक लगी न ही कोई निगरानी तंत्र सक्रिय हुआ यह सीधे तौर पर विभागीय लापरवाही और संवेदनहीनता को उजागर करता है।ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पहले ही सामाजिक दबाव भय और बदनामी के डर में जीती हैं। जब आरोपी शिक्षक जैसा प्रभावशाली व्यक्ति हो तो पीड़िता की चुप्पी स्वाभाविक हो जाती है। यही चुप्पी अपराधियों के लिए ढाल बनती है और व्यवस्था के लिए बहाना। यह मामला बताता है कि गांवों में शिकायत तंत्र कितना कमजोर है और पीड़ित के लिए न्याय तक पहुंचना कितना कठिन।बच्चों के भविष्य पर इसका प्रभाव सबसे भयावह है। जिस स्कूल में ऐसा शिक्षक वर्षों तक मौजूद रहा वहां पढ़ने वाले छात्र किस मानसिक माहौल में रहे होंगे। यह घटना शिक्षा विभाग के लिए अंतिम चेतावनी है। यदि अब भी कठोर कदम नहीं उठाए गए तो गांवों में शिक्षा व्यवस्था से विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा। जरूरत है सख्त विभागीय कार्रवाई की नियमित चरित्र जांच की और गांव स्तर पर निगरानी व्यवस्था बनाने की।बालोद का यह मामला समाज को चेतावनी देता है कि शिक्षा के नाम पर आंख मूंदकर भरोसा करना अब बच्चों के भविष्य के लिए खतरा बन चुका है। यदि व्यवस्था ने अब भी आंखें नहीं खोलीं तो अगला शिकार कोई और महिला या कोई मासूम बच्चा भी हो सकता है और तब जिम्मेदारी केवल आरोपी की नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की होगी।

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