हमर छत्तीसगढ़

महिला सशक्तिकरण पर मीनू साहू के स्पष्ट और मजबूत विचार

 

रिपोर्टर :- उत्तम साहु 

छत्तीसगढ़ में बालोद जिला के महिला मीडिया कर्मी मीनू साहू ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और अधिकार किसी भी सभ्य समाज की असली पहचान होते हैं। मेरे विचार से सरकार द्वारा महिलाओं की सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में शुरू की गई योजनाएँ एक सकारात्मक पहल जरूर हैं। महिलाओं को राजनीति में भागीदारी देने के लिए कानून बनाना और उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय भी लगातार यह कहते रहे हैं कि महिलाओं का सशक्त होना ही समाज और राज्य की वास्तविक प्रगति का आधार है। उनका मानना है कि जब महिलाएँ शिक्षित, सुरक्षित और आत्मनिर्भर होंगी तभी राज्य का समग्र विकास संभव हो सकेगा। लेकिन केवल योजनाएँ बनाना ही पर्याप्त नहीं है, उनका प्रभावी और ईमानदारी से क्रियान्वयन होना सबसे जरूरी है।आज भी समाज के कई हिस्सों में महिलाएँ असुरक्षा, भेदभाव और आर्थिक निर्भरता जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं। इसलिए यह कहना कि वर्तमान योजनाएँ पूरी तरह पर्याप्त हैं, शायद सही नहीं होगा। सरकार को महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए और ठोस कदम उठाने होंगे। स्वरोजगार को बढ़ावा देना, महिलाओं के लिए विशेष कौशल प्रशिक्षण केंद्र खोलना, छोटे उद्योगों और व्यवसाय के लिए आसान ऋण उपलब्ध कराना तथा ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को रोजगार से जोड़ना समय की बड़ी जरूरत है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भी कई अवसरों पर यह स्पष्ट कर चुके हैं कि सरकार की प्राथमिकता महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ठोस अवसर प्रदान करना है।महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध भी एक गंभीर चिंता का विषय हैं। केवल कानून बना देने से समस्या खत्म नहीं होती। जरूरी है कि कानूनों का सख्ती से पालन हो, पुलिस कार्रवाई तेज और निष्पक्ष हो तथा न्यायालय में मामलों का त्वरित निपटारा हो। जब अपराधियों को समय पर कठोर सजा मिलेगी, तभी समाज में कानून का डर पैदा होगा और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।इसके साथ ही महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करना भी बेहद जरूरी है। इसके लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर शिक्षा, जागरूकता अभियान, सेमिनार और सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाओं तक सही जानकारी पहुँचानी होगी। जब महिलाएँ अपने अधिकारों और कानूनों को समझेंगी, तभी वे अन्याय के खिलाफ मजबूती से खड़ी हो पाएंगी।जहाँ तक समाज में बराबरी की बात है, कानून के स्तर पर महिलाओं को समान अधिकार जरूर मिले हैं, लेकिन व्यवहारिक जीवन में अभी भी कई चुनौतियाँ मौजूद हैं। मानसिकता में बदलाव लाना भी उतना ही जरूरी है जितना कानून बनाना।साथ ही यह भी जरूरी है कि महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर बनाई जा रही नीतियाँ और श्रम कानून संतुलित हों। यदि महिलाओं को रात्रि पाली में काम करने की अनुमति दी जाती है, तो उनकी सुरक्षा, परिवहन और कार्यस्थल की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी भी सुनिश्चित होनी चाहिए।

मेरे अनुसार सच्चा महिला सशक्तिकरण तभी संभव है जब महिलाओं को सुरक्षा, सम्मान, समान अवसर और आर्थिक   एक साथ मिले। एक मजबूत महिला ही एक मजबूत समाज और सशक्त राष्ट्र की नींव रखती है। यही सोच आज राज्य और समाज दोनों के लिए मार्गदर्शक बननी चाहिए

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