जनता की सेहत से खिलवाड़ पूर्व में ‘दूध गंगा’ पर कार्रवाई के पांच घंटे बाद ही सील खुलना कई सवाल खड़े करता है!”

संपादक:- मीनू साहू
बालोद:- छत्तीसगढ़ में बालोद जिले के प्राचीन आस्था केंद्र शीतला मंदिर में रोड संचालित “दूध गंगा” नामक मिठाई निर्माण केंद्र पर कलेक्टर द्वारा गंदगी, अस्वच्छता और खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन के चलते की गई सीलिंग कार्रवाई आखिर महज पांच घंटे में कैसे खत्म हो गई? यह सवाल अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि जनता के स्वास्थ्य, कानून की विश्वसनीयता और पर्यावरण सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है।
जिस प्रतिष्ठान में खाद्य सामग्री के बीच गंदगी, दूषित वातावरण और नियमों की अनदेखी पाई गई, वहां बिना दोषियों पर ठोस कार्रवाई किए ताला खुल जाना सीधे-सीधे यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं प्रभाव, दबाव और संरक्षण की राजनीति कानून पर भारी पड़ रही है। अगर एक बार कार्रवाई सही थी, तो फिर इतनी जल्द राहत क्यों? और यदि कार्रवाई गलत थी, तो फिर सीलिंग क्यों हुई? प्रशासन की यह विरोधाभासी कार्यप्रणाली जनता के विश्वास को तोड़ने वाली दिखाई दे रही है।
भारत का Food Safety and Standards Act, 2006 स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी भी खाद्य निर्माण इकाई में स्वच्छता, सुरक्षित उत्पादन और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। वहीं Consumer Protection Act, 2019 उपभोक्ताओं को सुरक्षित और मानकयुक्त खाद्य सामग्री पाने का अधिकार देता है। यदि दूषित या अस्वच्छ वातावरण में मिठाइयां बन रही थीं, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि उपभोक्ताओं के अधिकारों पर सीधा हमला माना जाएगा।
सबसे गंभीर मामला पर्यावरणीय खतरे का है। दूध संयंत्रों में उपयोग होने वाले केमिकल से मशीनों की सफाई की जाती है, जिसके बाद हजारों लीटर केमिकल युक्त पानी निकलता है। पर्यावरण नियमों के तहत ऐसे संयंत्रों में Water Treatment Plant (WTP) और अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली अनिवार्य होती है। लेकिन बताया जा रहा है कि “दूध गंगा” का ट्रीटमेंट प्लांट बंद पड़ा है और परिसर से बाहर कबाड़ की तरह खड़ा है। यदि यह सच है, तो केमिकल युक्त पानी खुले में छोड़ा जाना पर्यावरण, भूजल और आम नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ खुला अपराध साबित हो सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है — यदि भविष्य में दूषित मिठाइयों से किसी की तबीयत बिगड़ती है, या केमिकल युक्त पानी से पर्यावरण प्रदूषण फैलता है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? प्रशासन, खाद्य विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या फिर वे लोग जिनके दबाव में कार्रवाई ठंडी पड़ गई? जनता जवाब मांग रही है, क्योंकि यह मामला सिर्फ एक दुकान का नहीं, बल्कि कानून, स्वास्थ्य और व्यवस्था की साख का है।



