हमर छत्तीसगढ़

एक पेड़ मां के नाम’ का संदेश या दिखावा? कलेक्टर बंगले के पीछे सरकारी क्वार्टर में पेड़ कटाई पर उठे जवाबदेही के सवाल,

आखिर नियम सबके लिए समान हैं या सत्ता के हिसाब से बदल जाते हैं?

संपादक:- मीनू साहू 

“आम आदमी के लिए कानून, अफसरों के लिए छूट? करोड़ों के हरित अभियान के बीच सरकारी बंगले पर पेड़ कटाई ने खड़े किए बड़े सवाल”

बालोद। छत्तीसगढ़ में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर सरकार और जिला प्रशासन “एक पेड़ मां के नाम” अभियान को बड़े स्तर पर चला रहा है। इस अभियान के प्रचार-प्रसार, आयोजन और वृक्षारोपण पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। जनता को हरियाली बचाने का संदेश दिया जा रहा है, पौधे लगाने की अपील की जा रही है और पेड़ों की सुरक्षा को सामाजिक जिम्मेदारी बताया जा रहा है। लेकिन जब यही संदेश सरकारी तंत्र की चौखट पर आकर दम तोड़ता दिखाई दे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।

बालोद जिला मुख्यालय में कलेक्टर बंगले के लगभग 50 मीटर पीछे स्थित सरकारी क्वार्टर परिसर में एक बड़े पेड़ को मशीन से काटे जाने का मामला सामने आया। कांग्रेस के युवा नेता मौके पर मौजूद साजन पटेल के अनुसार, जब उन्होंने पेड़ काटने वालों से पूछा कि किस अनुमति के आधार पर यह कटाई की जा रही है, तो जवाब मिला कि “यह एसडीओ साहब का बंगला है।”

“अनुविभागीय अधिकारी, विद्युत यांत्रिकी/लाइट मशीनरी, नलकूप एवं गेट्स, उपसंभाग बालोद” है। संबंधित परिसर सरकारी अधिकारी का आवास है। हालांकि, यह स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है कि पेड़ काटने की अनुमति ली गई थी या नहीं।

यहीं से सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। यदि किसी सामान्य नागरिक को अपनी निजी भूमि पर खड़े सूखे या जोखिम वाले पेड़ को हटाना हो, तो उसे वन विभाग, राजस्व विभाग और अन्य कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। आवेदन, निरीक्षण, अनुमति और लंबी प्रक्रिया पूरी करने के बाद ही पेड़ काटने की स्वीकृति मिलती है। बिना अनुमति पेड़ काटने पर आम व्यक्ति के खिलाफ जुर्माना और कानूनी कार्रवाई तक की जाती है।

लेकिन यदि सरकारी आवास में वही काम हो रहा हो, तो क्या नियम बदल जाते हैं? क्या अधिकारियों के लिए अलग कानून और जनता के लिए अलग व्यवस्था लागू होती है?

यदि संबंधित पेड़ की कटाई विधिवत अनुमति लेकर की गई है, तो प्रशासन को तत्काल उस अनुमति की प्रति सार्वजनिक करनी चाहिए। यदि अनुमति नहीं ली गई, तो फिर वही कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए जो किसी साधारण नागरिक के खिलाफ की जाती है? कानून की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब उसका पालन बिना भेदभाव के हो।

विडंबना यह है कि एक ओर पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने के लिए बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, अधिकारी नेता आते हैं फोटो खिंचवाते है और चले जाते हैं।दूसरी ओर यदि सरकारी परिसरों में ही नियमों का पालन संदिग्ध दिखाई दे, तो ऐसे अभियानों की गंभीरता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। जनता केवल भाषण नहीं, बल्कि समान जवाबदेही भी देखना चाहती है।

यह मामला केवल एक पेड़ का नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और समान कानून के सिद्धांत का है। यदि कोई अधिकारी या सरकारी संस्था नियमों से ऊपर दिखाई देती है, तो इससे जनता का विश्वास कमजोर होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इसी में है कि जवाबदेही हर स्तर पर समान हो।

आम जनता सहित हमारा भी सीधा सवाल है—

  • क्या इस पेड़ की कटाई के लिए सक्षम प्राधिकारी से अनुमति ली गई थी?
  • यदि अनुमति ली गई थी, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
  • यदि अनुमति नहीं थी, तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी?
  • क्या “एक पेड़ मां के नाम” अभियान केवल जनता के लिए है, जबकि सरकारी आवासों में नियमों की अनदेखी स्वीकार्य है?
  • आखिर आम आदमी के लिए कार्रवाई और प्रशासन के लिए छूट—यह कैसा कानून?

अब इस मामले पर चुप्पी साध ली  है, तो यह सवाल और भी तीखे होंगे कि क्या पर्यावरण संरक्षण केवल प्रचार का विषय है, या नियम वास्तव में सब पर समान रूप से लागू होते हैं?

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