हमर छत्तीसगढ़

बिजली विभाग के एस के बंड का तबादला जुलाई में, विदाई भी हो गई… फिर 15 अगस्त के मंच पर सम्मान!

बालोद प्रशासन के फैसले ने खड़े किए तीखे सवाल

संपादक:- मीनू साहू 

बालोद। बालोद जिला प्रशासन की कार्यशैली इन दिनों एक ऐसे मामले को लेकर सवालों के घेरे में है, जिसे सामान्य प्रशासनिक चूक कहकर टाला जाना आसान नहीं होगा। मामला बिजली विभाग के अधिकारी एस.के. बंड से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनका स्थानांतरण जुलाई 2026 में हो चुका था और जिला प्रशासन स्तर पर उन्हें विदाई भी दी गई थी। इसके बावजूद 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के प्रशासनिक मंच से उन्हें सम्मानित किया गया। यही पूरा घटनाक्रम अब प्रशासन की मंशा, निर्णय प्रक्रिया और सरकारी सम्मान की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।

सवाल सीधा है—जब अधिकारी का तबादला हो चुका था, विदाई दी जा चुकी थी, तो स्वतंत्रता दिवस समारोह में उन्हें किस आधार पर सम्मानित किया गया? क्या सम्मान के लिए जिले में कार्यरत अधिकारियों-कर्मचारियों की सूची उपलब्ध नहीं थी? क्या चयन समिति या जिम्मेदार अधिकारियों ने यह तक जांचना जरूरी नहीं समझा कि संबंधित अधिकारी वर्तमान में जिले में पदस्थ हैं अथवा नहीं?

सरकारी सम्मान कोई निजी समारोह की औपचारिकता नहीं होता। स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर प्रशासनिक मंच से किसी व्यक्ति को सम्मानित किया जाना उसके सार्वजनिक योगदान की स्वीकृति माना जाता है। ऐसे में यदि जुलाई में स्थानांतरण हो चुके अधिकारी को अगस्त में जिला प्रशासन के मंच से सम्मान मिलता है, तो यह महज तारीखों का अंतर नहीं, बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया की गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है।

और मामला यहीं समाप्त नहीं होता। एस.के. बंड के पूर्व कार्यकाल को लेकर स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और कमीशनखोरी जैसे गंभीर आरोपों की चर्चाएं होती रही हैं। इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अलग विषय है और यदि आरोप गलत हैं तो संबंधित अधिकारी को अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन जब किसी अधिकारी की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हों, तब उसे सरकारी मंच पर सम्मानित करने से पहले प्रशासन द्वारा पूरी पारदर्शिता बरतना स्वाभाविक अपेक्षा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि सम्मान के लिए उनका चयन किसने किया? उनकी उपलब्धियां क्या थीं? चयन का प्रस्ताव किस स्तर से आया? क्या उनके स्थानांतरण की जानकारी संबंधित अधिकारियों के पास थी? यदि थी तो फिर उन्हें सूची में शामिल क्यों किया गया? और यदि नहीं थी, तो जिला प्रशासन की सूचना प्रणाली आखिर कितनी गंभीरता से काम कर रही है?

बालोद जिले में ऐसे अनेक अधिकारी और कर्मचारी हैं, जो लगातार कठिन परिस्थितियों में अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं। कई कर्मचारी वर्षों तक बिना किसी विवाद के जनता की सेवा करते हैं। ऐसे लोगों के बीच तबादला हो चुके अधिकारी को राष्ट्रीय पर्व पर विशेष सम्मान मिलना स्वाभाविक रूप से असंतोष पैदा कर सकता है। इससे मेहनत करने वाले कर्मचारियों के मनोबल पर भी विपरीत असर पड़ने की आशंका है।

कुछ लोगों द्वारा यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि कलेक्टर कार्यालय की भूमिका के बिना ऐसा प्रशासनिक सम्मान संभव कैसे हुआ? यदि कार्यालय की भूमिका रही है तो प्रक्रिया सार्वजनिक की जानी चाहिए। यदि कोई अन्य विभाग जिम्मेदार है तो उसकी जिम्मेदारी भी स्पष्ट होनी चाहिए। आखिर किसी एक अधिकारी को सम्मानित करने के फैसले की जवाबदेही लेने के लिए प्रशासन तैयार क्यों नहीं दिखाई दे रहा?

विडंबना देखिए—एक तरफ तबादले के बाद विदाई, दूसरी तरफ कुछ ही समय बाद उसी अधिकारी को जिला प्रशासन के मंच से सम्मान। यह विरोधाभास अपने आप में पूरी कहानी कह रहा है। अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन चुप्पी साधने के बजाय सार्वजनिक रूप से बताए कि सम्मान किस नियम, किस उपलब्धि और किस प्रक्रिया के तहत दिया गया।

यदि चयन पूरी तरह नियमसम्मत था, तो संबंधित आदेश, चयन सूची और सम्मान का आधार सामने रखने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन यदि प्रक्रिया में लापरवाही हुई है तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

बालोद प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि सरकारी सम्मान वास्तव में उत्कृष्ट सेवा का पुरस्कार है या फिर कुछ चुनिंदा लोगों के लिए प्रशासनिक कृपा का माध्यम बनता जा रहा है। क्योंकि सवाल अब सिर्फ एस.के. बंड के सम्मान का नहीं है—सवाल उस व्यवस्था की विश्वसनीयता का है, जो एक तरफ अधिकारी को विदाई देती है और दूसरी तरफ कुछ ही समय बाद उसी व्यक्ति को अपने मंच पर सम्मानित करती है।

जवाब जरूरी है, क्योंकि सरकारी मंच पर उठे सवालों को सरकारी चुप्पी से दबाया नहीं जा सकता।

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