फीकी चमक में सिमटती अटल स्मृति, विज्ञापन की रोशनी में डूबता विकास — डौंडी से पूरे बालोद तक सवालों की गूंज

रिपोर्टर :- दिनेश कुमार नेताम
बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले का आदिवासी बहुल विकासखंड डौंडी आज एक विरोधाभास का प्रतीक बन चुका है। यहां स्मृतियों का सम्मान औपचारिकताओं में सिमट गया है और विकास के दावे पोस्टर-बैनरों की चकाचौंध में दम तोड़ते नजर आते हैं। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी, जिनके नाम पर गांव-कस्बों में चौक, सड़कें और योजनाएं गढ़ी गईं, वही अटल चौक आज खुद उपेक्षा का शिकार है। यह दृश्य केवल एक चौक की बदहाली नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का आईना है।डौंडी विकासखंड में ग्राम पंचायतों से लेकर मुख्य बाजारों तक अगर नजर दौड़ाई जाए, तो एक तरफ सरकारी विज्ञापनों, होर्डिंग्स और प्रचार सामग्री पर लाखों रुपये खर्च होते दिखते हैं। दीवारें रंगीन नारों से पटी हैं, हर आयोजन में चमकदार बैनर टंगे हैं, लेकिन दूसरी तरफ अटल चौक की फीकी रोशनी, उखड़ी टाइलें, टूटे फर्श और अंधेरे कोने एक कड़वा सवाल पूछते हैं—क्या स्मृति केवल नामकरण तक सीमित है?अटल जी को याद करने का दावा हर साल किया जाता है। भाषण होते हैं, पुष्पांजलि दी जाती है, फोटो खिंचती है और फिर सब कुछ पहले जैसा। न कोई स्थायी सौंदर्यीकरण, न रोशनी की व्यवस्था, न जानकारी देने वाला शिलालेख। आदिवासी विकासखंड में यह उपेक्षा और भी चुभती है, क्योंकि यहां प्रतीकों का सम्मान सामाजिक चेतना से जुड़ा होता है। जब वही प्रतीक धूल में पड़े हों, तो विकास की बातें खोखली लगती हैं।यह स्थिति केवल डौंडी तक सीमित नहीं है। पूरा बालोद जिला इस दोहरे चरित्र से जूझ रहा है। एक ओर योजनाओं की फाइलें मोटी होती जा रही हैं, दूसरी ओर जमीनी सच्चाई बिखरी हुई है। कहीं चौक बदहाल हैं, कहीं सार्वजनिक स्थल अंधेरे में डूबे हैं, तो कहीं स्मारक उपेक्षा की मार झेल रहे हैं। प्रशासनिक प्राथमिकताओं में प्रचार ऊपर और संरक्षण नीचे खिसकता दिखता है।सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस पर सवाल उठाने की इच्छाशक्ति भी कमजोर पड़ती जा रही है। जिम्मेदार विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर चुप्पी साध लेते हैं। पंचायत से लेकर ब्लॉक और जिला स्तर तक जवाबदेही धुंधली हो जाती है। नकारात्मक सोच यह भी है कि “चल रहा है” की मानसिकता ने विकास की परिभाषा को ही विकृत कर दिया है।अटल जी का नाम केवल राजनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि सुशासन, संवेदनशीलता और दूरदृष्टि का प्रतीक रहा है। उनकी स्मृति को फीकी चमक में कैद करना उस विरासत का अपमान है, जिसे आदिवासी अंचल भी सम्मान की नजर से देखता है। अगर सच में श्रद्धांजलि देनी है, तो वह स्थायी, दिखने वाली और महसूस होने वाली होनी चाहिए।डौंडी का अटल चौक आज एक चेतावनी है—अगर अब भी प्राथमिकताएं नहीं बदलीं, तो विज्ञापन की रोशनी में असली विकास हमेशा अंधेरे में ही रहेगा। बालोद जिले को तय करना होगा कि उसे दिखावा चाहिए या सम्मान, प्रचार चाहिए या प्रतिबद्धता। यही फैसला आने वाले समय में विकास की दिशा तय करेगा।



