हमर छत्तीसगढ़

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में एकता, संस्कृति और स्वाभिमान का संकल्प कुसुमकसा से उठी राष्ट्र चेतना की गूंज

 

रिपोर्टर :- दिनेश कुमार नेताम

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो विगत सौ वर्षों से राष्ट्र निर्माण, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना के लिए निरंतर कार्य कर रहा है, उसके शताब्दी वर्ष में ग्राम कुसुमकसा की पावन भूमि पर आयोजित विशाल हिन्दू सम्मेलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि संघ के विचार, संस्कार और संकल्प का जीवंत प्रतिबिंब है। यह अवसर आत्मचिंतन, आत्मबोध और आत्मजागरण का सशक्त क्षण बनकर सामने आया, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि जब समाज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन के मार्गदर्शन में उद्देश्य के साथ एकत्र होता है, तब विचार केवल शब्द नहीं रहते, वे चेतना और आंदोलन का रूप ले लेते हैं।कार्यक्रम का शुभारंभ भारतमाता और छत्तीसगढ़ महतारी के तैलचित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन से हुआ। यह दीप केवल तेल और बाती से नहीं जला, बल्कि उसमें पूर्वजों का त्याग, संस्कृति की गरिमा और भविष्य के प्रति संकल्प प्रज्वलित हुआ। कुसुमकसा मंडल के पंद्रह गांवों से पधारे हजारों लोगों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि समाज आज दिशा, दृष्टि और एकजुटता चाहता है, और यह दिशा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
इस हिन्दू सम्मेलन में विचारों की धारा भले ही विविध रही, लेकिन लक्ष्य एक रहा। डा भूपेंद्र मिश्रा ने अपने विचारों में समसामयिक घटनाओं का उल्लेख करते हुए यह स्पष्ट किया कि वर्तमान समय में हिन्दू सम्मेलन क्यों आवश्यक है। उनका संदेश था कि जब समाज सजग होता है, तभी वह स्वयं की रक्षा करने के साथ-साथ राष्ट्र को भी मजबूत बनाता है।डा देवेन्द्र माहला ने अपने उद्बोधन में जाति-पांति और संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर सामाजिक समरसता का आह्वान किया। उन्होंने यह रेखांकित किया कि मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं; क्योंकि विभाजित समाज कभी सशक्त नहीं बन सकता। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उसी भावना को आगे बढ़ाता है, जिसमें समरस और संगठित समाज की कल्पना की गई है।
सेवानिवृत्त आईएएस जी आर चुरेन्द्र ने परिवार और समाज के बीच संतुलन बनाए रखने पर विशेष बल दिया। उन्होंने फिजूलखर्ची और दिखावे से दूर रहकर सामूहिक, सादे और आदर्श विवाह जैसी सामाजिक पहल को अपनाने की आवश्यकता बताई। यह विचार केवल आर्थिक अनुशासन नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक सुधार की दिशा भी तय करता है।विशिष्ट अतिथि बालमुकुंद सिंह ने वीर रस और राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत अपनी रचनाओं के माध्यम से चेतना जगाने का प्रभावी प्रयास किया। उनकी वाणी ने यह स्मरण कराया कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि भावनात्मक एकता का नाम है।मुख्य वक्ता रामपाल ने स्वदेशी मूल्यों पर आधारित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंच परिवर्तन को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, पारिवारिक मूल्यों की मजबूती, सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्यबोध और स्वदेशी जीवनशैली को सशक्त भारत की नींव बताया। यह विचार संघ के शताब्दी वर्ष में समाज को नई दिशा देने वाले संकल्प के रूप में उभरे।इस अवसर पर कुसुमकसा, गिधाली और धुर्वाटोला के बच्चों द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने यह सिद्ध किया कि आने वाली पीढ़ी में संस्कार और देशभक्ति की जड़ें मजबूत हो रही हैं। कार्यक्रम का प्रभावी संचालन नंदकिशोर पिस्दा द्वारा किया गया तथा आभार प्रदर्शन संयोजक संतोष जैन ने किया।यह हिन्दू सम्मेलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों से प्रेरित सामाजिक चेतना को जागृत करने का सशक्त माध्यम है। यह मंच यह संदेश देता है कि जब समाज संघ के मार्ग पर चलकर एक-दूसरे के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ता है, तभी सशक्त, संगठित और संस्कारित राष्ट्र का निर्माण होता है। कुसुमकसा से उठी यह चेतना गांव-गांव और मन-मन तक पहुंचे—यही इस सम्मेलन और संघ शताब्दी वर्ष की वास्तविक सार्थकता है।एकता से शक्ति, संस्कृति से पहचान और सेवा से राष्ट्र निर्माण।

Related Articles

Back to top button