पड़कीभाट नल-जल योजना में सचिवशाही का ज़हर सचिव का मनमानी

रिपोर्टर :- रिखी साहू
बालोद/पलारी—: छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना, जिसका उद्देश्य हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाना है, बालोद जिले की कुछ ग्राम पंचायतों में भ्रष्ट मानसिकता और मनमानी का शिकार होती नजर आ रही है। ग्राम पंचायत ओझागहन और आश्रित ग्राम पड़कीभाट में नल-जल योजना अब जनसेवा नहीं, बल्कि सचिव की निजी सत्ता का औजार बनती जा रही है। यहाँ नियम, सरपंच-पंच और पारदर्शिता सबको ताक पर रखकर एकतरफा फैसले थोपे जा रहे हैं। गुरूर विकासखंड के इन दो गांवों में लगभग 4000 की आबादी निवास करती है, जहां 15 वार्डों में जल आपूर्ति की जिम्मेदारी पंचायत को दी गई है। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि पंचायत प्रतिनिधियों को दरकिनार कर सचिव हेमलाल साहू अकेले ही संचालन कर रहे हैं। जल वितरण के लिए नियुक्त दो कर्मचारियों—ग्राम ओझागहन के खोरबाहरा राम साहू और ग्राम पड़कीभाट के रिखीराम साहू—के साथ किया जा रहा खुला भेदभाव इसका ज्वलंत उदाहरण है।एक ही योजना, एक ही जिम्मेदारी और लगभग समान श्रम के बावजूद खोरबाहरा राम साहू को प्रतिमाह 3000 रुपये और रिखीराम साहू को मात्र 2500 रुपये दिए जा रहे हैं। सवाल सीधा है—आखिर यह अंतर क्यों? क्या मेहनत का मोल गांव देखकर तय किया जा रहा है या सचिव की निजी पसंद-नापसंद से? यह भेदभाव केवल आर्थिक अन्याय नहीं, बल्कि शासन के निर्देशों का भी सीधा उल्लंघन है।रिखीराम साहू ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। पहले सचिव ने टालमटोल की, फिर औपचारिकता निभाते हुए आवेदन मांग लिया। 16 अक्टूबर 2025 को विधिवत हस्ताक्षरित आवेदन सौंपा गया, लेकिन आज तक न तो सरपंच-पंच को इसकी जानकारी दी गई और न ही मानदेय में सुधार हुआ। यह चुप्पी संयोग नहीं, बल्कि जवाबदेही से बचने की सोची-समझी रणनीति प्रतीत होती है।
ग्रामीणों का कहना है कि रिखीराम साहू पूरी निष्ठा से अपनी जिम्मेदारी निभाता है। सुबह-शाम नियमित जल आपूर्ति, आपात स्थितियों में बिना किसी लेन-देन के सेवा और निजी व्यस्तताओं के बावजूद पानी उपलब्ध कराना—यह सब उसकी कार्यकुशलता को दर्शाता है। इसके बावजूद उसे कम मेहनताना देना न केवल अपमानजनक है, बल्कि पंचायत तंत्र की संवेदनहीनता को उजागर करता है।ग्राम पंचायत ओझागहन की सरपंच गंगाबाई साहू ने भी इस पूरे मामले पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि पड़कीभाट से संबंधित आवेदन उन्हें आज तक नहीं दिखाया गया और न ही कोई कार्रवाई की सूचना दी गई। इससे यह आशंका गहराती है कि विकास कार्यों की राशि का उपयोग मनमाने ढंग से कर फर्जी बिलों के सहारे हिसाब मिलाया जा रहा है।यह मामला केवल दो कर्मचारियों के वेतन का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के अपहरण का है। जब सचिव ही सर्वेसर्वा बन जाए और चुने हुए प्रतिनिधि मूकदर्शक, तब योजनाएं जनकल्याण नहीं, शोषण का माध्यम बन जाती हैं। अब जरूरत है कि जिला प्रशासन इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच करे, दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो और समान काम के लिए समान मेहनताना सुनिश्चित किया जाए। अन्यथा नल-जल योजना का उद्देश्य कागजों में सिमट कर रह जाएगा और गांवों में अन्याय की प्यास और गहरी होती चली जाएगी।



