बालोद कलेक्ट्रेट में जवाबदेही की कैद सवालों पर पहरा, सच पर ताला और ‘गोपनीयता’ की आड़ में लोकतंत्र का गला घोंटता तंत्र

बालोद:-छत्तीसगढ़ के बालोद जिला निवासी RTI कार्यकर्ता यशवंत निषाद ने कहा कि बालोद कलेक्ट्रेट में इन दिनों जो कुछ घट रहा है, वह किसी प्रशासनिक व्यवस्था का उदाहरण नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर सीधा प्रहार है। शिक्षा विभाग के भीतर संचालित की जा रही तथाकथित “गोपनीय कक्ष” अब केवल एक कमरा नहीं, बल्कि सत्ता की उस मानसिकता का प्रतीक बन चुकी है, जहाँ पारदर्शिता अपराध और सवाल पूछना दुस्साहस माना जा रहा है। यह स्थिति न सिर्फ चौंकाने वाली है, बल्कि खतरनाक भी—क्योंकि जब प्रशासन सवालों से डरने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि भीतर कुछ न कुछ गड़बड़ हो रहा है।बताया जा रहा है कि बालोद कलेक्ट्रेट शायद प्रदेश ही नहीं, देश का ऐसा दुर्लभ उदाहरण बनता जा रहा है, जहाँ सूचना का अधिकार नहीं, बल्कि “अनुमति का अधिकार” लागू है। पत्रकार यदि जनहित में किसी विषय पर जानकारी मांग लें, तो जवाब देने के बजाय उनसे कलेक्टर की अनुमति-पत्र की प्रतिलिपि और पत्रकारिता का “लाइसेंस” मांगा जाता है। मानो पत्रकारिता कोई व्यवसायिक परमिट हो, जिसे प्रशासन चाहे तो मान्यता दे, चाहे तो रद्द कर दे।यह विडंबना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अपमान है कि जिस चौथे स्तंभ की भूमिका सत्ता और व्यवस्था को आईना दिखाने की है, उसी को पहचान साबित करने के लिए दर-दर भटकाया जा रहा है। जनसंपर्क कार्यालय में वर्षों से पत्रकारों की सूची, पहचान-पत्र और मान्यता की व्यवस्था मौजूद है। इसके बावजूद शिक्षा विभाग की वरिष्ठ अधिकारी मधुलिका तिवारी द्वारा “लाइसेंस” की मांग करना या तो घोर अज्ञानता को दर्शाता है, या फिर जानबूझकर खड़ी की गई वह दीवार है, जिससे असहज सवालों की रोशनी भीतर न पहुँच सके।सूत्रों की मानें तो यही वह “गोपनीय कक्ष” है, जहाँ जंबूरी जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजन से जुड़ी फाइलों को सुरक्षित नहीं, बल्कि छिपाकर रखा गया है। जैसे ही खर्च, निर्णय या जिम्मेदारी पर सवाल उठते हैं, एक ही जवाब उछाल दिया जाता है—“यह कलेक्टर मैडम का आदेश है, मामला गोपनीय है।” सवाल यह है कि आखिर गोपनीय क्या है? जनता का पैसा, जनता के नाम पर हुए फैसले और जनता के हित से जुड़े कार्यक्रम कब से राजकीय रहस्य बन गए?सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि हर कठिन प्रश्न पर जवाबदेही नीचे लेने के बजाय ऊपर टाल दी जाती है। पत्रकारो को कभी शिक्षा मंत्री, कभी मुख्यमंत्री और कभी पूरी कैबिनेट का नाम लेकर डरती हैं, ताकि बीच का प्रशासनिक तंत्र खुद को पाक-साफ साबित करता रहे। यह प्रशासनिक कुशलता नहीं, बल्कि जवाबदेही से भागने की सुनियोजित रणनीति है।राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी इस आग में घी डालने का काम कर रही हैं। भाजपा जिलाध्यक्ष चेमन देशमुख ने इसे “राजनीतिक रंग” देने का आरोप लगाते हुए कहा कि जानकारी विधिसम्मत प्रक्रिया से ली जानी चाहिए। वहीं कांग्रेस जिलाध्यक्ष चंद्रेश हिरवानी ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताते हुए कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता किसी कलेक्टर की कृपा पर निर्भर नहीं हो सकती। उनका आरोप है कि जब-जब घोटालों और खर्चों पर सवाल उठते हैं, तब-तब “गोपनीयता” का कवच पहन लिया जाता है।आज बालोद में असली सवाल यह नहीं है कि कोई गोपनीय कक्ष है या नहीं। असली सवाल यह है कि प्रशासन कब तक सूचना, सवाल और सच को ताले में बंद रखेगा? पत्रकार दुश्मन नहीं होते, वे समाज का दर्पण होते हैं। और इतिहास गवाह है—दर्पण से डरकर परदे डालने वाले तंत्र अंततः बेनकाब होकर ही रहते हैं।



