हमर छत्तीसगढ़

नीर चेतना से जनचेतना तक तांदुला नदी पुनर्जीवन अभियान में उमड़ा जनसैलाब, सहभागिता दिखी लेकिन विरोधाभास भी उजागर

 

बालोद:- छत्तीसगढ़ के जिला मुख्यालय बालोद की जीवनरेखा मानी जाने वाली तांदुला नदी को स्वच्छ, निर्मल और प्रवाहमान बनाए रखने के उद्देश्य से जिला प्रशासन द्वारा संचालित “नीर चेतना अभियान” के अंतर्गत एक व्यापक श्रमदान एवं जनसहभागिता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस पुनीत पहल ने एक ओर जन-जागरूकता और सामूहिक जिम्मेदारी का संदेश दिया, वहीं दूसरी ओर हालिया घटनाओं ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली और पर्यावरणीय नियमों के पालन पर गंभीर सवाल भी खड़े किए हैं।सुबह से ही तांदुला नदी तट पर उत्साहपूर्ण वातावरण देखने को मिला। नगर के प्रबुद्ध नागरिक, सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता, स्वयंसेवी संस्थाएं, मीडिया प्रतिनिधि, महिला कमांडो, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी महिलाएं, विभिन्न विभागों के अधिकारी-कर्मचारी, एनएसएस, रेडक्रॉस, विद्यालय एवं महाविद्यालयों के छात्र-छात्राएं तथा आमजन बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सभी ने मिलकर नदी से कचरा, प्लास्टिक अपशिष्ट और गंदगी हटाने में श्रमदान किया। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि तांदुला नदी को लेकर समाज में अब उपेक्षा की जगह जिम्मेदारी की भावना आकार ले रही है।
इस अभियान का सकारात्मक पक्ष यह रहा कि प्रशासन और जनता के बीच समन्वय स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी ने नदी संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप दिया। संदेश साफ था—पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कार है।हालांकि, इसी बीच एक गंभीर नकारात्मक पहलू भी सामने आया है, जो पूरे अभियान की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। बताया जाता है कि मात्र दो दिन पूर्व इसी तांदुला नदी में चैन माउंटेन मशीन से सफाई कराई गई थी। इस कार्य के लिए दुर्ग के एक ठेकेदार को लगभग 12 लाख रुपये का ठेका दिया गया। जबकि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि किसी भी नदी, नाले या जलस्रोत में चैन माउंटेन जैसी भारी मशीनों का उपयोग नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे नदी का प्राकृतिक तल, जैव विविधता और जल प्रवाह गंभीर रूप से प्रभावित होता है। इसके बावजूद तांदुला नदी में मशीनों का प्रयोग होना पर्यावरणीय कानूनों और न्यायालय के आदेशों की खुली अवहेलना माना जा रहा है।पर्यावरणविदों का मानना है कि इस तरह की मशीनों से की गई “सफाई” वास्तव में नदी के लिए दीर्घकालिक नुकसानदायक होती है। इससे मछलियों, जलीय जीवों और प्राकृतिक अवसाद संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे में एक ओर श्रमदान और जनचेतना की बात करना, और दूसरी ओर मशीनों से नदी का दोहन करना, एक स्पष्ट विरोधाभास को दर्शाता है।राजनीतिक दृष्टि से भी यह अभियान चर्चा में रहा। राज्य में भाजपा की सरकार और कांग्रेस के विपक्ष में होने के बावजूद, दोनों दलों के जिला अध्यक्षों ने इस मुद्दे पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दी।भाजपा जिलाध्यक्ष चेमन देशमुख ने इसे केंद्र और राज्य सरकार की पर्यावरणीय सोच से जोड़ते हुए जनभागीदारी को अहम बताया। वहीं कांग्रेस जिलाध्यक्ष चंद्रेश हिरवानी ने श्रमदान को स्वागतयोग्य बताते हुए इसे केवल औपचारिकता तक सीमित रहने का खतरा जताया और स्थायी समाधान की मांग की।कुल मिलाकर, तांदुला नदी स्वच्छता अभियान ने जनचेतना की मजबूत तस्वीर जरूर पेश की है, लेकिन चैन माउंटेन मशीन के प्रयोग जैसी घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हम वास्तव में पर्यावरण संरक्षण के प्रति ईमानदार हैं। अब आवश्यकता है कि नीर चेतना केवल प्रतीकात्मक अभियान न रहे, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का सख्ती से पालन करते हुए वैज्ञानिक, पर्यावरण-संवेदनशील और दीर्घकालिक नीति के साथ तांदुला नदी को पुनर्जीवित किया जाए, ताकि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सच में जीवनदायिनी बनी रहे।

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