नेशनल जंबूरी की चमक के पीछे प्रशासनिक हड़बड़ी उजागर, काम और कागजी तैयारियों पर उठे सवाल

बालोद::- छत्तीसगढ़ में बालोद जिला के ग्राम दुधली में 09 से 13 जनवरी तक प्रस्तावित नेशनल रोवर रेंजर जंबूरी को राष्ट्रीय गरिमा के अनुरूप भव्य बनाने के लिए मुख्य सचिव विकासशील ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए तैयारियों की समीक्षा की। मंच, सुरक्षा, आवास, भोजन, स्वास्थ्य, बिजली, संचार और यातायात—हर व्यवस्था को समयबद्ध पूरा करने के निर्देश दिए गए। कलेक्टर दिव्या उमेश मिश्रा, पुलिस अधीक्षक योगेश कुमार पटेल, जिला पंचायत सीईओ सुनील चंद्रवंशी, अपर कलेक्टर चंद्रकांत कौशिक, एडीशनल एसपी मोनिका ठाकुर सहित वरिष्ठ अधिकारी बैठक में जुड़े। प्रशासनिक सक्रियता का यह दृश्य सकारात्मक है, लेकिन इसी के साथ कुछ गंभीर सवाल भी सामने आते हैं।राष्ट्रीय आयोजन की घोषणा होते ही तैयारियों की रफ्तार तेज हुई, पर जमीनी सच्चाई यह भी है कि कई कार्य टेंडर प्रक्रिया से पहले शुरू होने की चर्चा ने प्रशासनिक प्रणाली की कमजोरियों को उजागर किया है। नियमों की बुनियाद पर खड़ा तंत्र यदि जल्दबाजी में प्रक्रिया को दरकिनार करता दिखे, तो पारदर्शिता और जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। आयोजन की सफलता महत्वपूर्ण है, पर नियमों की अनदेखी कर सफलता का दावा दीर्घकाल में प्रशासन की साख को नुकसान पहुंचाता है।वीडियो कांफ्रेंसिंग में अधोसंरचना, अस्थायी अस्पताल, 24 घंटे निर्बाध बिजली, जनरेटर, अग्निशमन, एटीएम, मोबाइल-इंटरनेट, मीडिया सेंटर, शौचालय-स्नानागार, पेयजल, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और वीआईपी मूवमेंट तक की बारीक समीक्षा हुई। यह व्यापकता सराहनीय है। लेकिन सवाल यह है कि यदि योजनाएं पहले से थीं, तो प्रक्रियागत स्वीकृतियां समय पर क्यों नहीं ली गईं? क्यों अंतिम समय में अस्थायी उपायों पर निर्भरता बढ़ी?
भोजन की गुणवत्ता और स्वच्छता पर विशेष जोर दिया गया—यह सकारात्मक संकेत है। 12 हजार प्रतिभागियों, जिनमें 4 हजार छत्तीसगढ़ से और विदेशी प्रतिभागी भी शामिल हैं, के लिए मानक अनुरूप व्यवस्था अनिवार्य है। सुरक्षा को लेकर भी पुख्ता इंतजामों का आश्वासन दिया गया। फिर भी, इतने बड़े आयोजन में टेंडर, सप्लाई और सेवाओं की चयन प्रक्रिया का स्पष्ट, सार्वजनिक और दस्तावेजी होना उतना ही जरूरी है जितना मंच की सजावट।शिक्षा सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेशी ने उद्घाटन और समापन की रूपरेखा बताई—राज्यपाल रमेन डेका द्वारा शुभारंभ, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की उपस्थिति में समापन। यह प्रतिष्ठा आयोजन का मान बढ़ाती है। पर प्रतिष्ठा के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है कि हर खर्च, हर ठेका और हर सेवा नियमों के दायरे में हो।
कलेक्टर ने तैयारियों की जानकारी दी, एसपी ने सुरक्षा इंतजामों का भरोसा दिलाया। यह समन्वय प्रशासन की ताकत है। लेकिन ताकत का सही उपयोग तभी माना जाएगा जब जल्दबाजी की जगह प्रक्रिया, दिखावे की जगह दस्तावेज और अस्थायी समाधान की जगह टिकाऊ व्यवस्था हो। राष्ट्रीय मंच पर जिले की छवि सिर्फ भव्यता से नहीं, सुशासन से बनती है।
निष्कर्ष साफ है—जंबूरी का सफल होना जरूरी है, पर उससे भी जरूरी है कि सफलता नियमों की रीढ़ पर खड़ी हो। टेंडर से पहले काम, अस्पष्ट चयन और आखिरी समय की हड़बड़ी जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों पर सख्त आत्ममंथन जरूरी है। प्रशासन यदि अभी भी सुधार करे, प्रक्रियाओं को सार्वजनिक करे और जवाबदेही तय करे, तो यह आयोजन सिर्फ यादगार नहीं, मिसाल बनेगा।
भाजपा नेता ने कहा कि ग्राम दुधली में आयोजित होने जा रहा नेशनल रोवर रेंजर जंबूरी बालोद जिले ही नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय है। यह आयोजन प्रदेश की प्रशासनिक क्षमता, सांस्कृतिक समृद्धि और युवा शक्ति को राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करेगा। राज्य सरकार और जिला प्रशासन पूरी गंभीरता और प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहा है। कम समय में व्यापक स्तर पर की जा रही तैयारियां यह दर्शाती हैं कि सरकार इस आयोजन को ऐतिहासिक बनाने के लिए संकल्पित है। कुछ तकनीकी प्रक्रियाओं को लेकर उठ रहे सवालों के बीच भी यह स्पष्ट है कि उद्देश्य केवल आयोजन को सफल और सुरक्षित बनाना है।
कांग्रेस जिलाध्यक्ष चंद्रेश हिरवानी ने कहा कि नेशनल जंबूरी के नाम पर प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह अव्यवस्थित नजर आ रही है। टेंडर से पहले काम शुरू होना सीधे तौर पर नियमों की धज्जियां उड़ाने जैसा है। यह आयोजन बच्चों और युवाओं के नाम पर है, लेकिन इसके पीछे मनमानी और जल्दबाजी साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस जिलाध्यक्ष ने आरोप लगाया कि पारदर्शिता के बिना किए जा रहे कार्य भविष्य में बड़े घोटाले का रूप ले सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि प्रशासन वास्तव में राष्ट्रीय गरिमा की बात करता है, तो उसे पहले नियमों का पालन करना सीखना चाहिए, न कि आखिरी समय में दिखावटी तैयारियों से जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करना चाहिए।
नेशनल रोवर रेंजर जंबूरी के नोडल अधिकारी हिमांशु मिश्रा को लेकर भी आयोजन से पहले कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय स्तर पर आरोप लग रहे हैं कि तैयारियों के नाम पर नियमों की अनदेखी करते हुए कुछ कार्य बिना स्पष्ट प्रक्रिया और पूर्व स्वीकृति के आगे बढ़ाए गए। टेंडर से पहले कार्य प्रारंभ होने, सीमित दायरे में निर्णय लेने और पारदर्शिता की कमी को लेकर नोडल अधिकारी की भूमिका पर उंगलियां उठ रही हैं। चर्चा है कि महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं में चयन और खर्च को लेकर स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई, जिससे संदेह और असंतोष का माहौल बना है। इन कथित काले कारनामों को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या राष्ट्रीय आयोजन की आड़ में प्रशासनिक जिम्मेदारियों का दुरुपयोग तो नहीं हो रहा। यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो इसका सीधा असर न केवल आयोजन की विश्वसनीयता पर पड़ेगा, बल्कि जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न खड़े होंगे।



