दल्लीराजहरा में राष्ट्रीय बॉडी बिल्डिंग खेल बना राजनीतिक अखाड़ा

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला का दल्ली राजहरा—जो पहाड़ों के बीच बसा अलौकिक सुंदरता, झरनों, देवी-देवताओं का गढ़ और लौह नगरी, खनिज नगरी के नाम से पहचाना जाता है—यदि “खिलाड़ियों की नगरी” कहा जाए तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस नगर ने ऑल इंडिया फुटबॉल टूर्नामेंट से लेकर बॉक्सिंग, कराटे, एथलेटिक्स, मैराथन, वेट लिफ्टिंग, पावर लिफ्टिंग और बॉडी बिल्डिंग जैसे आयरन गेम्स तक, हर खेल में देश को प्रतिभाएं दी हैं। यही वह नगर है जिसे भारत में 50 स्टेट और 11 नेशनल चैंपियनशिप कराने का गौरव प्राप्त है। यहीं के खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परचम फहराकर जिले, राज्य और देश का नाम रोशन किया है।इन सभी उपलब्धियों के पीछे एक ऐसा व्यक्ति है, जिसकी मेहनत, लगन और संयम ने इतिहास रचा। इनके जुनून का परिणाम यह है कि 17 लड़के-लड़कियां—जो सभी गरीब परिवारों से आते हैं—आज सरकारी नौकरी में हैं। इन बच्चों को खेल के प्रति जागरूक करना, निरंतर अभ्यास कराना, उन्हें बेहतरीन खिलाड़ी बनाना और जिले-राज्य के लिए पदक दिलाकर देश का मान बढ़ाना—इसी मिसाल को देखते हुए हरिनाथ को वीर हनुमान सिंह एवार्डी से सम्मानित किया गया।लेकिन यही वीर हनुमान सिंह एवार्डी, जो सरल और सीधे स्वभाव के हैं, किस तरह राजनीति का शिकार हुए—यह कहानी लोकतांत्रिक देश में खेल के साथ किए गए अन्याय की तस्वीर पेश करती है। जब इन्होंने राष्ट्रीय बॉडी बिल्डिंग ओपन चैंपियनशिप कराने की योजना बनाई, तो आयोजन को मूर्त रूप देने से पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री से आशीर्वाद लिया। अपनी खेल-गाथा मुख्यमंत्री को बताई। मुख्यमंत्री ने इनकी लगन और राष्ट्रीय खेल की महत्ता को देखते हुए राजहरा आने और तैयारी करने को कहा।इसके बाद यह खिलाड़ी दिन-रात आयोजन की तैयारी में जुट गया—चारों ओर मुख्यमंत्री के बैनर-पोस्टर, निमंत्रण कार्ड, सीएम ट्रॉफी के नाम से आयोजन—और अपने स्तर से पूरे भारत से आने वाले खिलाड़ियों के लिए रहने और भोजन की बेहतरीन व्यवस्था। लेकिन इसी आयोजन में मुख्यमंत्री के पारिवारिक दामाद का हवाला देकर जिस तरह राजनीति खेली गई, वह शर्मनाक है। न मुख्यमंत्री आए, न कोई नेता—बल्कि एक वीर हनुमान सिंह एवार्डी के साथ मज़ाक बनाया गया।
यहां तक कि लोकतंत्र में खेल में भी राजनीतिक जहर घोलते हुए, जिला के एक भाजपा नेता द्वारा लोगों से मिलने वाले सहयोग पर रोक लगा दी गई। न प्रशासन से सहयोग मिला, न कोई नेता आगे आया। हालात ऐसे बनाए गए मानो यह आयोजन अपराध हो। यह वही परिस्थिति है, जैसी तब बनती है जब कोई किसान आत्महत्या की कगार पर पहुंच जाता है—बेबस, अकेला और अपमानित।
इस संकट की घड़ी में खेल भावना अभी जिंदा थी। चेयरमेन छत्तीसगढ़ रेड क्रॉस सोसायटी तोमन साहू, जिला पंचायत उपाध्यक्ष, विशाल मोटवानी, राजाखान और बालोद के बुद्धिजीवी पत्रकार साथियों ने हौसला अफजाई की। आयोजन के अंत तक साथ रहकर इसे सफल बनाया। ट्रॉफी और मेडल की पूरी व्यवस्था करवाई गई।
चेयरमेन रेड क्रॉस सोसायटी छत्तीसगढ़ तोमन साहू ने भव्य आयोजन का उद्घाटन किया।
यह सवाल आज पूरे जिले के सामने है—जब सत्ता में भाजपा की सरकार रहते एक राष्ट्रीय चैंपियनशिप में खिलाड़ी को ऐसा समय देखना पड़े, तो आने वाले कल में खेल और खिलाड़ियों का भविष्य क्या होगा? यदि यही गंदी राजनीति जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब जिले में खेल और खिलाड़ी का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि खेल की आत्मा पर किया गया सीधा प्रहार है—जिसका जवाब अब समाज और व्यवस्था दोनों को देना होगा।



