शराब की दुकान नहीं,अपराधशाला बालोद जिला के डौंडी में व्यवस्था कटघरे में कानून का सार्वजनिक अपमान,

बालोद/डौंडी :—छत्तीसगढ़ के बालोद जिले की डौंडी नगर पंचायत में संचालित शराब दुकान अब प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण भर नहीं रही, बल्कि यह उस व्यवस्था का नग्न चेहरा बन चुकी है जहाँ कानून, नियम और नैतिकता—तीनों को रोज़ खुलेआम रौंदा जा रहा है। यह दुकान अब मदिरा विक्रय केंद्र नहीं, बल्कि संगठित भ्रष्टाचार, अवैध वसूली और संरक्षण प्राप्त अपराध का स्थायी अड्डा बन चुकी है। यहाँ जो चल रहा है, वह किसी एक व्यक्ति की मनमानी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित तंत्र है, जिसे ऊपर से मौन स्वीकृति प्राप्त है।दुकान में पदस्थ सेल्समैन संतोष रामटेके द्वारा “शोले” ब्रांड की देशी शराब को सरकारी मानकों से अधिक मात्रा में, बिना किसी वैध माप-तौल और पूरी निर्लज्जता के बेचा जा रहा है। न तो तय मात्रा का पालन हो रहा है, न निर्धारित दर का। अतिरिक्त शराब के बदले अतिरिक्त पैसे वसूले जा रहे हैं—वह भी खुले काउंटर पर, बिना किसी डर या संकोच के। यह सीधी-सीधी ठगी, भ्रष्टाचार और आपराधिक विश्वासघात है, जो राज्य के नियमों पर तमाचा है।इस अवैध कारोबार का तरीका और भी घिनौना है। आम उपभोक्ताओं को जानबूझकर भ्रमित किया जाता है—कभी ब्रांड बदले जाते हैं, कभी मात्रा में हेरफेर की जाती है। अवैध बिक्री के लिए अलग तंत्र, अलग संकेत और अलग व्यवहार है। यह दोहरा खेल साबित करता है कि यह दुकान अब सरकारी नियंत्रण से बाहर निकल चुकी है और निजी लालच के हवाले कर दी गई है।
यह मामला केवल राजस्व की चोरी तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक विनाश की संगठित प्रक्रिया है। अवैध शराब की खुली उपलब्धता ने नशे की लत को विस्फोटक रूप दिया है। घरेलू हिंसा, सार्वजनिक झगड़े, चोरी, मारपीट और असामाजिक गतिविधियाँ अब सामान्य होती जा रही हैं। युवाओं को अंधेरे की ओर धकेला जा रहा है और पूरा नगर भय, असुरक्षा और अव्यवस्था के माहौल में जीने को मजबूर है। जिस दुकान से शासन को आय मिलनी चाहिए, वही दुकान समाज को खोखला करने का औजार बन चुकी है।स्वतंत्र मीडिया पड़ताल में इस काले कारोबार के ठोस और प्रत्यक्ष प्रमाण सामने आए हैं। ग्राहकों के बयान, लेन-देन की प्रक्रिया और प्रत्यक्षदर्शी गवाह—सब कुछ चीख-चीखकर बता रहा है कि यह खेल आज का नहीं, बल्कि लंबे समय से निर्बाध रूप से चल रहा है। ऐसे में यह कहना कि प्रशासन अनजान था, न सिर्फ हास्यास्पद है बल्कि अपराध में साझेदारी जैसा है।सबसे गंभीर प्रश्न आबकारी विभाग, स्थानीय प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर खड़ा होता है। क्या निरीक्षण केवल रजिस्टरों में पूरे होते हैं? क्या कार्रवाई सिर्फ निचले कर्मचारियों तक सीमित रहती है? या फिर यह मान लिया जाए कि अवैध कमाई की धारा ऊपर तक बह रही है, इसलिए सब कुछ देखकर भी आंखें मूंद ली गई हैं? यह चुप्पी साधारण चुप्पी नहीं, बल्कि संदेहास्पद मौन है।
कानून में प्रावधान स्पष्ट हैं, दंड कठोर हैं और कार्रवाई की शक्ति मौजूद है। लेकिन जब उनका इस्तेमाल नहीं होता, तब कानून खुद मज़ाक बन जाता है। डौंडी की यह शराब दुकान आज एक ऐसा आईना है, जिसमें प्रशासन की निष्क्रियता, नैतिक पतन और संभावित संरक्षण साफ दिखाई देता है।अब चेतावनी या आश्वासन का समय समाप्त हो चुका है। दोषी सेल्समैन पर तत्काल आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए, दुकान का लाइसेंस निलंबित हो, और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष, सार्वजनिक जांच की जाए। यदि यह नहीं हुआ, तो यह साफ संदेश जाएगा कि डौंडी में कानून नहीं, बल्कि अवैध मुनाफा सर्वोच्च है।यदि व्यवस्था अब भी मौन रहती है, तो यह मौन उसकी सबसे बड़ी स्वीकारोक्ति होगा—कि अपराध से भी बड़ा अपराध वह शासन है, जिसने सब कुछ जानते हुए भी कुछ नहीं किया।



