गुरूर–बालोद में आवारा मवेशी संकट किसान पिस रहे, सत्ता-विपक्ष की राजनीति तेज

रिपोर्ट:- उत्तम साहू
फसल से सड़क तक संकट, समाधान पर सवाल
बालोद / गुरूर :- क्षेत्र में छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में इस समय किसानों की सबसे बड़ी मुसीबत पानी की कमी नहीं, बल्कि आवारा गाय-मवेशियों का आतंक बन चुका है। भू-जल गिरावट के कारण प्रशासन ने फसल चक्र बदलवाकर दलहन-तिलहन बोने की सलाह दी। गुरूर विकासखंड के लगभग 79 पंचायतों और गांवों के किसानों ने शासन की बात मानकर फसल बदली, मगर अब वही खेत पशुओं के झुंड से उजड़ रहे हैं। खेत चौपट, किसान रातभर पहरा देने को मजबूर और जिम्मेदारी तय करने में सत्ता-विपक्ष दोनों आमने-सामने हैं।
किसान का दर्द योजना बदली, सुरक्षा नहीं मिली
किसानों ने धान छोड़कर चना, मसूर, सरसों जैसी फसलें लगाईं ताकि पानी बचे और आमदनी सुधरे। लेकिन खुले घूमते मवेशी खेतों में घुसकर पूरी मेहनत नष्ट कर रहे हैं। किसान दिन-रात खेत में डेरा डाल रहे हैं, फिर भी नुकसान रुक नहीं रहा।समस्या सिर्फ फसल की नहीं — आर्थिक घाटा, शारीरिक थकावट और मानसिक तनाव तीनों बढ़ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि पशुपालक दूध बंद होते ही पशुओं को छोड़ देते हैं, जिससे गांव-गांव झुंड बन गए हैं।
सड़क पर भी खतरा दुर्घटनाओं की बड़ी वजह
ये मवेशी सिर्फ खेत नहीं खा रहे, सड़कों पर भी बैठकर हादसों को न्योता दे रहे हैं। रात में वाहन चालकों को अचानक सामने पशु मिलते हैं और दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। लोग पूछ रहे हैं — जब प्रशासन हेलमेट और जुर्माने पर सख्त है, तो सड़क से पशु हटाने पर क्यों नहीं?
कांग्रेस का तर्क पुरानी योजना बंद होने से संकट
विपक्ष में बैठी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कहना है कि पहले उनकी सरकार के समय “नरवा-गरवा-घुरवा-बारी” योजना के तहत गांव-गांव गोठान बने थे। पशु वहीं रहते थे, जिससे खेत और सड़क दोनों सुरक्षित थे। उनका आरोप है कि वर्तमान व्यवस्था कमजोर पड़ने से संकट बढ़ा है।
भाजपा का पक्ष जिम्मेदारी साझा, समाधान जारी
प्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी सरकार का तर्क है कि पशु छोड़ना खुद पालकों की लापरवाही है। शासन योजनाएं बना सकता है, पर ग्रामीणों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। प्रशासन का कहना है कि गौठान पुनर्सक्रिय करने, कांजी हाउस बढ़ाने और पंचायत स्तर पर निगरानी की दिशा में काम चल रहा है।
असली सवाल: राजनीति नहीं, स्थायी समाधान
सच्चाई यह है कि समस्या बहुस्तरीय है —
पशुपालकों की जवाबदेही तय नहीं
गौठान व्यवस्था कमजोर
सड़क सुरक्षा उपाय अधूरे
किसानों को मुआवजा तंत्र अस्पष्ट
अगर छत्तीसगढ़ में कृषि बचानी है तो राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़ना होगा। पंचायत स्तर पर पशु पंजीकरण, सामुदायिक गोठान संचालन, खेत सुरक्षा योजना और सड़क से पशु हटाने की स्थायी व्यवस्था ही समाधान है।
किसान अब भाषण नहीं, ठोस कार्रवाई चाहता है — क्योंकि खेत बचेगा तभी गांव बचेगा।



