हमर छत्तीसगढ़

अस्पष्ट सूचना पटल से उठते सवाल ग्राम पंचायत ओडागहन की पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह

 

रिपोर्टर:- उत्तम साहू 

बालोद/ पलारी:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में ग्रामीण विकास योजनाओं का मूल आधार पारदर्शिता, जनभागीदारी और जवाबदेही माना जाता है, लेकिन जब योजना से जुड़ा सूचना पटल ही धुंधला, अव्यवस्थित और पढ़ने में कठिन दिखाई दे, तो यह सीधे-सीधे प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है। ग्राम पंचायत ओडागहन (जिला बालोद) में लगाया गया यह सूचना पट्ट भी ऐसी ही उदासीनता की कहानी कहता नजर आता है।जिस योजना का उद्देश्य रोजगार उपलब्ध कराना, जल संरक्षण को बढ़ावा देना और ग्रामीण आधारभूत ढांचे को मजबूत करना है, उसी योजना की जानकारी ऐसे लिखी गई है कि सामान्य व्यक्ति उसे ठीक से पढ़ ही नहीं पाता। कहीं अक्षर छोटे हैं, कहीं रंग फीका पड़ चुका है, तो कहीं पंक्तियों का संतुलन बिगड़ा हुआ दिखता है। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि सूचना पट्ट लगाने की जिम्मेदारी को गंभीरता से नहीं लिया गया, बल्कि केवल औपचारिकता निभाई गई।सबसे अहम बात यह है कि सूचना पटल जनता के अधिकार का दस्तावेज होता है। यही वह माध्यम है जिससे ग्रामीण जान पाते हैं कि काम कब शुरू हुआ, कितना बजट स्वीकृत हुआ, मजदूरी कितनी तय है और जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं। जब यही जानकारी अस्पष्ट हो, तो पारदर्शिता स्वतः संदिग्ध बन जाती है। ऐसे में ग्रामीणों के मन में शंका उठना स्वाभाविक है कि कहीं आंकड़ों में हेरफेर तो नहीं, कहीं काम अधूरा तो नहीं, या कहीं भुगतान में गड़बड़ी तो नहीं।

ग्राम पंचायत स्तर पर अक्सर यह देखा जाता है कि योजनाओं के बोर्ड दीवार सजाने के लिए लगा दिए जाते हैं, लेकिन उनकी पठनीयता और उपयोगिता पर ध्यान नहीं दिया जाता। यह प्रवृत्ति न केवल प्रशासनिक कमजोरी को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि जनता को जानकारी देना प्राथमिकता में शामिल नहीं है। यदि सूचना स्पष्ट नहीं होगी तो सामाजिक निगरानी कैसे संभव होगी? और जब निगरानी ही कमजोर होगी, तो योजनाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठना तय है।ग्राम पंचायत ओडागहन को चाहिए कि वह इस स्थिति को हल्के में न ले। सूचना पटल को साफ अक्षरों में, टिकाऊ रंगों से, सुव्यवस्थित प्रारूप में और ऐसी ऊंचाई पर लगाया जाए जहां हर व्यक्ति आसानी से पढ़ सके। साथ ही समय-समय पर उसका नवीनीकरण भी किया जाना जरूरी है। यह केवल बोर्ड सुधारने का मामला नहीं, बल्कि पंचायत की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न है।

यदि विकास कार्य सचमुच ईमानदारी से हो रहे हैं तो उन्हें छिपाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। स्पष्ट सूचना ही भरोसा पैदा करती है, जबकि धुंधले बोर्ड अविश्वास को जन्म देते हैं। अगर ऐसी लापरवाही जारी रही तो योजनाएं चाहे जितनी बनें, लेकिन जनता का भरोसा कमजोर पड़ता जाएगा — और यही किसी भी लोकतांत्रिक ग्रामीण व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा होता है।

इसी ग्राम पंचायत क्षेत्र में खारुन नदी के डोंगीघाट पर लगभग 2 करोड़ 31 लाख रुपये की लागत से कराए जा रहे कार्य को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि संबंधित कार्य में आशीष तिवारी द्वारा न तो स्पष्ट सूचना पटल लगाया था और न ही निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर भरोसा किया जा सकता है क्योंकि काम शुरू होने के करीब 15 दिन बाद ही कार्य कर दिया गया, जिससे गुणवत्ता, निगरानी और भुगतान प्रक्रिया पर ग्रामीणों में गंभीर संदेह पैदा हो गया है।

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