सच की सज़ा बालोद में सवाल उठाने पर व्हाट्सऐप ग्रुप से बाहर—अब क्या आवाज़ दबाने के लिए कार्रवाई की तैयारी?

बालोद:- छत्तीसगढ़ के जिला बालोद में मामला अब सिर्फ एक व्हाट्सऐप ग्रुप से हटाए जाने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह साफ संकेत दे रहा है कि सिस्टम सवालों से असहज है। जिला प्रशासन द्वारा संचालित आधिकारिक ग्रुप से सच लिखने और बाल विवाह जैसे गंभीर मुद्दे पर तथ्य रखने वाले को बाहर करना, पारदर्शिता के दावों पर सीधा सवाल खड़ा करता है।
जिस विषय पर कार्रवाई होनी चाहिए थी, वहां कार्रवाई करने के बजाय सवाल उठाने वाले को ही साइडलाइन कर दिया गया। यह रवैया बताता है कि “सुशासन” के दावे कागजों तक सीमित हैं, और जमीनी हकीकत में असहमति के लिए जगह लगातार सिमट रही है।
अब इस पूरे घटनाक्रम ने एक नई चिंता को जन्म दिया है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि कहीं आगे चलकर आवाज़ उठाने वालों—खासतौर पर संपादक मीनू साहू—पर किसी तरह की प्रशासनिक या कानूनी कार्रवाई का दबाव न बनाया जाए। अगर ऐसा होता है, तो यह न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चोट होगी, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ भी जाएगा।
यह सवाल अब सीधे प्रदेश नेतृत्व तक जाता है। माननीय मुख्यमंत्री से अपेक्षा है कि वे इस पूरे मामले पर संज्ञान लें—सिर्फ बाल विवाह जैसे गंभीर अपराध पर ही नहीं, बल्कि उन लोगों की सुरक्षा और स्वतंत्रता पर भी, जो सच को सामने लाने का काम कर रहे हैं।
क्योंकि अगर सच बोलना ही गुनाह बन जाएगा, तो फिर “बाल विवाह मुक्त” जैसे दावे नहीं, बल्कि “सवाल मुक्त सिस्टम” की सच्चाई सामने आएगी।



