अस्पताल या अव्यवस्था का अड्डा?—अखबार में नाश्ता, बूंद-बूंद पानी को तरसते मरीज और प्रशासन की शर्मनाक चुप्पी

संपादक:- मीनू साहू
बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों बदहाली, लापरवाही और प्रशासनिक निष्क्रियता की भयावह तस्वीर बन चुकी है। डौंडीलोहारा ब्लॉक के 100 बिस्तरों वाले सरकारी अस्पताल में मरीजों को कथित तौर पर अखबार की शीट में लपेटकर नाश्ता परोसे जाने का मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिस अस्पताल में मरीज इलाज और सुरक्षा की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, वहां उन्हें जहरीली स्याही वाले अखबार में समोसा-पोहा थमाना सीधे तौर पर मानव स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ माना जा रहा है।सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ. विनोद चौरका ने खुद को इस पूरी व्यवस्था से अनजान बताया। सवाल यह उठता है कि जिस अस्पताल की निगरानी की जिम्मेदारी अधिकारियों पर है, वहां मरीज क्या खा रहे हैं, भोजन कैसे बन रहा है और किस हालत में परोसा जा रहा है — इसकी जानकारी तक नहीं होना क्या घोर प्रशासनिक विफलता नहीं है? आपूर्तिकर्ता द्वारा घर में खाना पकाकर अस्पताल में पहुंचाने की बात स्वीकार करना इस अव्यवस्था को और भी गंभीर बना देता है। इससे साफ जाहिर होता है कि अस्पताल परिसर में खाद्य गुणवत्ता और स्वच्छता की निगरानी लगभग नाममात्र की रह गई है।इधर बालोद जिला अस्पताल की हालत भी किसी आपदा क्षेत्र से कम नहीं दिखाई दे रही। बीते डेढ़ महीने से तीनों बोरवेल सूख चुके हैं और 200 बिस्तरों वाले अस्पताल में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। जहां रोजाना 8000 लीटर पानी की जरूरत है, वहां मुश्किल से 6000 लीटर पानी जुटाया जा रहा है। मरीजों के परिजन 300 मीटर दूर तांदुला जलाशय में नहाने को मजबूर हैं, शौचालयों में पानी नहीं, कूलर सूखे पड़े हैं और 44 डिग्री की झुलसाती गर्मी में पंखे तथा एसी भी जवाब दे चुके हैं। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कथित “निरीक्षण संस्कृति” पर उठ रहा है। अधिकारी दौरे और बैठकों के दावे तो करते हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि अस्पतालों में मरीज मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आखिर क्यों हर बार शिकायत सामने आने के बाद ही कार्रवाई का दिखावा शुरू होता है? क्या प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना या जनआक्रोश का इंतजार कर रहा है?स्वास्थ्य सेवाओं की यह बदहाल तस्वीर केवल लापरवाही नहीं, बल्कि संवेदनहीन व्यवस्था का जीवंत प्रमाण बन चुकी है।



