हमर छत्तीसगढ़

विभागीय वसूली फैसले पर उठे सवाल पूरी स्कूल वसूली मामले ने बढ़ाई शिक्षा व्यवस्था की चिंता उच्च न्यायालय से प्राप्त हुआ न्याय

 

संपादक :- मीनू साहू 

कांकेर /बालोद :- छत्तीसगढ़ में कांकेर जिले के चारामा विकासखंड अंतर्गत स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पूरी इन दिनों एक प्रशासनिक वसूली निर्णय को लेकर चर्चा में है। विद्यालय से जुड़े एक शिक्षिका के खिलाफ की गई विभागीय वसूली कार्रवाई ने शिक्षा विभाग की कार्यशैली, पारदर्शिता और नियमों के पालन को लेकर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

मामला अब केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि पूरे विभागीय तंत्र की जवाबदेही पर चर्चा का विषय बन गया है।जानकारी के अनुसार, संबंधित शिक्षिका पर विभाग द्वारा बड़ी राशि की वसूली का आदेश जारी किया गया। इसके साथ ही वेतनमान में संशोधन करते हुए उनके मूल वेतन में कटौती की गई और सेवा अभिलेख में प्रतिकूल टिप्पणी भी दर्ज कर दी गई। इस कार्रवाई के बाद संबंधित कर्मचारी ने विभागीय प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए न्यायालय की शरण ली।

माननीय उच्च न्यायालय ने शिक्षिका के पक्ष में आदेश पारित करते हुए नियम विरुद्ध वसूली को रद्द किया तथा शिक्षिका से की गई राशि की वसूली को तत्काल वापस करने का आदेश दिया। साथ ही उनकी सेवा पुस्तिका में किए गए त्रुटिपूर्ण इंद्राज को विलोपित करने का निर्देश भी पारित किया गया।

कर्मचारी पक्ष का आरोप है कि कार्रवाई करने से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया और जल्दबाजी में निर्णय लिया गया। मामला तब और अधिक चर्चा में आया जब इसे लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।याचिका में यह तर्क रखा गया कि वर्षों तक विभाग स्वयं वेतन जारी करता रहा, लेकिन बाद में उसी भुगतान को त्रुटिपूर्ण बताकर पूरी जिम्मेदारी कर्मचारी पर डाल दी गई। कर्मचारी पक्ष का कहना है कि वेतन निर्धारण में शिक्षिका की कोई त्रुटि नहीं थी। सेवा पुस्तिका सत्यापन में संबंधित अधिकारियों द्वारा गलत सत्यापन किया गया।

सर्वविदित है कि सेवा पुस्तिका सत्यापन में कर्मचारियों से संबंधित अधिकारी अनुचित आर्थिक मांग रखते हैं। इसी अनुचित मांग से शिक्षकों को बचाने हेतु संगठन अब शासन से प्रत्येक विकासखंड में सेवा पुस्तिका सत्यापन हेतु कैंप लगाने की मांग कर रहे हैं।

इस घटनाक्रम के बाद जिले के शिक्षकों और कर्मचारियों में नाराजगी देखी जा रही है। कई कर्मचारी संगठनों का मानना है कि बिना स्पष्ट जांच और निष्पक्ष सुनवाई के आर्थिक दंडात्मक कार्रवाई करना कर्मचारियों के अधिकारों के विपरीत है। उनका कहना है कि विभागीय स्तर पर हुई त्रुटियों का बोझ केवल कर्मचारियों पर डालना उचित नहीं माना जा सकता।

स्थानीय लोगों के बीच भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। लोगों का कहना है कि शिक्षा विभाग को प्रशासनिक निर्णय लेते समय पारदर्शिता और नियमों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, ताकि कर्मचारियों में असुरक्षा की भावना उत्पन्न न हो। यह मामला अब शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही, निष्पक्षता और प्रशासनिक

संवेदनशीलता की परीक्षा बनता जा रहा है।फिलहाल सभी की नजरें विभाग के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। अब देखना होगा कि शिक्षा विभाग इस विवाद पर क्या आधिकारिक स्पष्टीकरण देता है और भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं।

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