रनचिराई पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही पर बड़े सवाल
नहर किनारे कथित अवैध गतिविधियों का अड्डा? शिकायतों के ढेर, कार्रवाई शून्य

संपादक:- मीनू साहू
बालोद। जिले के रनचिराई थाना क्षेत्र के ग्राम मसूल स्थित नहर किनारे कथित अवैध गतिविधियों को लेकर ग्रामीणों का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि क्षेत्र में लंबे समय से संदिग्ध गतिविधियां संचालित होने की शिकायतें संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई जाती रही हैं, लेकिन अब तक न तो प्रभावी कार्रवाई दिखाई दी और न ही ऐसा कोई ठोस कदम, जिससे लोगों का विश्वास कानून-व्यवस्था पर मजबूत हो सके। इससे पुलिस की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों सवालों के घेरे में आ गई हैं।
ग्रामीणों के अनुसार क्षेत्र में लंबे समय से संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंचाई जाती रही, लेकिन शिकायतों का परिणाम धरातल पर दिखाई नहीं दिया। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते तथ्यात्मक जांच, निगरानी और आवश्यक वैधानिक कार्रवाई होती, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं बनती। शिकायतों के बावजूद कथित गतिविधियां जारी रहने के आरोपों ने प्रशासनिक सतर्कता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय लोगों का दावा है कि इस मामले में टंकी बड़ौदा निवासी लक्ष्मण का नाम सामने आ रहा है। हालांकि, किसी भी व्यक्ति की संलिप्तता का निर्धारण केवल निष्पक्ष जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जा सकता है। ऐसे में जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि वे बिना किसी दबाव या पक्षपात के पूरे मामले की तह तक पहुंचें।
ग्रामीणों का कहना है कि आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी रही कि लगातार मिल रही शिकायतों के बाद भी मौके पर प्रभावी निगरानी नहीं बढ़ाई गई। क्या शिकायतों का सत्यापन किया गया? क्या क्षेत्र का निरीक्षण हुआ? यदि हुआ तो उसके निष्कर्ष सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए? इन सवालों का जवाब केवल जांच से ही मिल सकता है। जब शिकायतों के बावजूद कार्रवाई का परिणाम दिखाई नहीं देता, तब स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में संदेह और असंतोष बढ़ता है।
गांव के लोगों ने जिला पुलिस अधीक्षक और जिला प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए। यदि जांच के दौरान किसी भी व्यक्ति की संलिप्तता प्रमाणित होती है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुरूप कठोर वैधानिक कार्रवाई की जाए। साथ ही यदि यह पाया जाता है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी ने शिकायतों की अनदेखी की, कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही बरती या जांच प्रक्रिया में बाधा पहुंचाई, तो उसके विरुद्ध भी विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
ग्रामीणों का मानना है कि कानून की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है, जब कार्रवाई प्रभावशाली, निष्पक्ष और साक्ष्य आधारित हो। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो दोषियों को किसी भी प्रकार का संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। वहीं यदि आरोप असत्य पाए जाते हैं, तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर पूरे मामले का तथ्यात्मक खुलासा किया जाना चाहिए, ताकि अफवाहों और भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।
अब पूरे जिले की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पुलिस और प्रशासन इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं। यह केवल एक गांव का मामला नहीं, बल्कि शिकायतों पर प्रशासन की संवेदनशीलता, पुलिस की जवाबदेही और कानून के निष्पक्ष क्रियान्वयन की परीक्षा भी है। जनता को आरोपों पर नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, पारदर्शी कार्रवाई और कानून के समान अनुपालन पर भरोसा चाहिए। यही इस पूरे मामले की सबसे बड़ी कसौटी होगी।



