हमर छत्तीसगढ़

भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन से संकटग्रस्त तांदुला जलाशय

के पी चंद्राकर

बालोद: छत्तीसगढ़ के बालोद जिले का तांदुला जलाशय, जो कभी समृद्धि, हरियाली और प्राकृतिक धरोहर का प्रतीक माना जाता था, आज गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। अवैध ढाँचों, प्रदूषण और तंत्र की गड़बड़ियों ने इसके जल की शुद्धता और उपयोगिता दोनों पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। यह जलाशय जहाँ एक ओर हजारों ग्रामीणों के लिए पेयजल का प्रमुख साधन है,

वहीं दूसरी ओर किसानों की फसलों का जीवनदायी स्रोत भी है। रिसॉर्ट से निकलने वाला अपशिष्ट सीधे जलाशय में समा रहा है और आर्द्रभूमि में हो रहे अनाधिकृत निर्माण ने पूरे प्राकृतिक तंत्र को असंतुलित कर दिया है।तांदुला बांध मूल रूप से सिंचाई और जन उपयोग के लिए निर्मित हुआ था। इसका वेटलैंड इलाका पक्षियों, मछलियों और अन्य जलीय जीवों का स्थायी आवास रहा है, जो पर्यावरणीय ताने-बाने को मजबूती देता है। वर्षों तक यह जलाशय बालोद की खेती-बाड़ी और हरियाली का आधार बना, किंतु अब रिसॉर्ट का गंदा जल न केवल पेयजल को हानिकारक बना रहा है बल्कि खेतों की सिंचाई भी प्रदूषित हो रही है।

गाँववालों का आरोप है कि नियम-कायदों की अनदेखी कर वेटलैंड में कब्जे और निर्माण हुए। निर्माण से पूर्व की गई मुरुम की अंधाधुंध खुदाई ने प्राकृतिक स्वरूप को बिगाड़ दिया। स्थानीय प्रतिनिधियों, अफसरों और व्यावसायिक हितों की मिलीभगत से वसूली और साठगांठ के मामले सामने आ रहे हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण और पर्यावरणीय कानूनों की अनदेखी ने प्रशासन की लापरवाही और भ्रष्टाचार को उजागर किया है।सबसे अधिक प्रभावित किसान हैं। उनका कहना है कि दूषित पानी खेतों तक पहुँचकर उपज घटा रहा है। भविष्य में जल संकट की आशंका और गहरी हो रही है।

किसानों की रोज़ी-रोटी को निजी मुनाफे के लिए खतरे में डाला जा रहा है। ग्रामीण और पर्यावरण कार्यकर्ता लगातार आवाज उठा रहे हैं, लेकिन उनकी बातों को दबा दिया जाता है। यह स्थिति सामाजिक अन्याय का स्पष्ट उदाहरण है।पर्यावरणविद चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जल्द सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो इस जलाशय की जैविक विविधता नष्ट हो जाएगी। प्रदूषित जल से इंसानों का स्वास्थ्य, कृषि उत्पादन और पूरे क्षेत्र की खाद्य सुरक्षा व अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर होगा। किसान और स्थानीय समुदाय की माँग है कि wetlands में हुए अवैध कब्जों को तुरंत हटाया जाए और दोषी अफसरों, नेताओं तथा रिसॉर्ट मालिकों पर कठोर कार्रवाई की जाए। रिसॉर्ट से बहने वाले अपशिष्ट को रोकने के लिए कड़े प्रावधान लागू हों और जलाशय की समय-समय पर निगरानी की व्यवस्था हो। संरक्षण कार्यों में किसानों और आम जनता की भागीदारी सुनिश्चित हो तथा प्रशासनिक कामकाज में पारदर्शिता लाई जाए।

तांदुला जलाशय सिर्फ जलस्रोत नहीं, बल्कि बालोद की पहचान और सांस्कृतिक धरोहर भी है। इसका संरक्षण पर्यावरणीय और सामाजिक उत्तरदायित्व है। यदि शासन ने तत्काल ठोस कदम नहीं उठाए तो आने वाली पीढ़ियों पर इसका दुष्प्रभाव दिखेगा। सर्व समाज, किसान संगठन और ग्रामीण समुदाय सरकार से अपील कर रहे हैं कि तांदुला जलाशय की पवित्रता और अस्तित्व बचाने के लिए त्वरित कार्रवाई की जाए।

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