बालोद शिक्षा विभाग में मनमानी का किला — जितेंद्र गजेन्द्र प्रकरण ने डीईओ की लाचारी की परतें उधेड़ दीं

बालोद शिक्षा विभाग में मनमानी का किला — जितेंद्र गजेन्द्र प्रकरण ने डीईओ की लाचारी की परतें उधेड़ दीं!

बालोद: छत्तीसगढ़ के बालोद जिले का शिक्षा विभाग अब शिक्षा नहीं भ्रष्टाचार का तमाशा बन चुका है। सूत्रों से पता चला है कि दो लाख के नारियल जिला शिक्षा कार्यालय के मंदिर में फोड़ने के बाद जितेंद्र गजेन्द्र को पाररास स्कूल में पोस्टिंग मिलना तय माना जा रहा हैं ये महज अफवाह भी हो सकता लेकिन अगर गजेंद्र को मन मुताबिक स्कूल देगा तो ये प्रकरण बेनकाब कर देगा कि बालोद के शिक्षा अधिकारी नियमों की किताबें सिर्फ अलमारी की सजावट के लिए रखते हैं। सरेखा पूर्व माध्यमिक विद्यालय का हेडमास्टर पद आज भी कागजों पर भरा-पूरा नजर आता है जबकि हकीकत में स्कूल बिना किसी मजबूत कमान के डगमगा रहा है। यह महज एक व्यक्ति की चूक नहीं बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की बेईमानी का खुला नमूना है।जितेंद्र गजेन्द्र जो कभी बीआरसीसी बालोद की कुर्सी पर विराजमान थे अब भी सरेखा विद्यालय से तनख्वाह की मोटी रकम झटक रहे हैं—जबकि स्कूल में उनकी मौजूदगी एक पुरानी कहानी से ज्यादा कुछ नहीं। शिक्षक संहिता की धारा 5(1), 7(3) और 9(2) का बेशर्म उल्लंघन कर प्रशासन ने साफ बता दिया है कि कानून का डर तो बस नाममात्र के लिए है। विभाग की खामोशी इस घपले में साझेदारी का पक्का सबूत है।सामाजिक कार्यकर्ता मोहन निषाद ने कड़वी चुभन वाली बात कही कि यह सारा तमाशा जिला शिक्षा अधिकारी की नजरों के नीचे ही बुना जा रहा है।

जहां-जहां ये पहुंचती हैं वहां भ्रष्टाचार का नया रंग चढ़ जाता है। तिवारी की रंग-ढंग को लेकर शिक्षकों में खीझ का सैलाब उफान मार रहा है। निरीक्षण और अनुशासन की ड्यूटी निभाने के बजाय डीईओ दफ्तर ने मनमर्जी और रसूख वालों की ढाल को अपना धर्म बना लिया है।ग्राम सरेखा के सीधे साधे लोग बार-बार जनसुनवाई में गुहार लगाकर थक चुके हैं लेकिन कार्रवाई की बजाय फाइलों में बस नोट्स की मोटी परतें जम रही हैं। शिक्षा विभाग की यह सुस्ती सिर्फ एक स्कूल की सिरदर्दी नहीं बल्कि जिले के नन्हे-मुन्नों के कल के साथ खिलवाड़ है। जब शिक्षक अपनी असली जगह से गायब होकर भी पैसे की थैली भर सकते हैं तो शिक्षा की चमक-दमक की सोचना ही बेकार है।बालोद के शिक्षा तंत्र में यह किस्सा खतरे की सायरन है। अगर शासन ने फौरन दखल न दिया तो ऐसे कागजी भूत आने वाली नस्लों के सपनों को चूर-चूर कर देंगे। शिक्षा विभाग को अब फैसला लेना होगा नियम का राज चलेगा या रसूख का बाज? क्योंकि जितेंद्र गजेन्द्र जैसे हर किस्से बालोद को शिक्षा का नाम नहीं बल्कि लज्जा का ठप्पा दे रहे हैं।




