जब कार्रवाई भी ‘सेटिंग’ बन जाए! शिव अर्पण अस्पताल सिकोसा प्रकरण पर नई पड़ताल, सिस्टम की गहराई में ही भ्रष्टाचार

जब कार्रवाई भी ‘सेटिंग’ बन जाए! शिव अर्पण अस्पताल सिकोसा प्रकरण पर नई पड़ताल, सिस्टम की गहराई में ही भ्रष्टाचार
बालोद/गुंडरदेही:—सिकोसा के “शिव अर्पण अस्पताल” कांड ने बालोद जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था का चेहरा उजागर तो किया, लेकिन यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली सवाल यह है कि इतने बड़े फर्जीवाड़े के बावजूद विभागीय कार्रवाई आखिर क्यों ठंडी पड़ी है? क्या यह प्रशासनिक सुस्ती है या फिर किसी सुनियोजित “संरक्षण तंत्र” की परछाई?स्थानीय सूत्रों के अनुसार, गुंडरदेही क्षेत्र में ऐसे कई छोटे-बड़े “प्राइवेट अस्पताल” चल रहे हैं जो न तो रजिस्ट्रेशन सूची में हैं, न ही इन पर नियमित निरीक्षण होता है।

सूत्रों का कहना है कि हर महीने इन संस्थानों से “अनौपचारिक वसूली” का खेल चलता है, ताकि अधिकारी आँख मूँद लें और फर्जी इलाज का कारोबार यूँ ही फलता-फूलता रहे।जनचर्चा में यह भी सवाल उठ रहा है कि स्वास्थ्य निरीक्षक सत्येंद्र मारकंडे को लेकर विभाग इतना नरम क्यों है? क्या वजह है कि बार-बार शिकायतें होने के बाद भी उनके खिलाफ न तो जांच बैठती है, न ही निलंबन की सिफारिश? यह वही अधिकारी हैं जिनके क्षेत्र में बीते दो वर्षों में तीन फर्जी अस्पताल पकड़े गए, पर किसी का लाइसेंस रद्द नहीं हुआ।
बालोद जिले के समाजसेवी और नेशनल खिलाड़ी मोहन निषाद ने कहा —
“यह केवल अस्पताल का मामला नहीं, यह प्रशासन और मुनाफाखोरों की मिलीभगत का गठजोड़ है। जब सिस्टम अपराधियों से डरने लगे, तब जनता का मरना तय है।”
दूसरी ओर, स्वास्थ्य विभाग के सूत्र बताते हैं कि ऊपरी स्तर से भी ऐसे मामलों पर “नरमी” बरतने के निर्देश मिलते हैं। यानी आदेश ऊपर से हैं कि “फील्ड में शांति रहे”, चाहे फर्जी इलाज से लोग मर ही क्यों न जाएँ।इस पूरे घटनाक्रम ने स्वास्थ्य महकमे की जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आखिर ऐसे हालात में जनता किस पर भरोसा करे — डॉक्टर पर या “डॉक्टर के नाम पर चल रहे धंधे” पर?अब जिले के जागरूक नागरिक और सामाजिक संगठन मांग कर रहे हैं कि सिकोसा प्रकरण की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या विशेष टीम से कराई जाए, ताकि सच सामने आए और भ्रष्ट नेटवर्क का पर्दाफाश हो।क्योंकि यदि “सेवा” का नाम लेकर मौत बेची जा रही है और शासन चुप है, तो यह चुप्पी ही सबसे बड़ा अपराध है — और बालोद का आम नागरिक अब इस मौन के खिलाफ आवाज़ उठाने को तैयार दिख रहा है।




